छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजिन्हें तैरना आता था वे घबराकर कीचड़ में धँस गये। जो कुछ बचकर बाहर आये उन्हें कांट ने लाठी से पीटना शुरू किया। उन्होंने फिर से युद्ध में लौटने का असफल प्रयास किया। लड़ाई हाथ से छूट गयी थी। लाल चमड़ी का वाइसराय कीचड़ और मिट्टी में बुरी तरह सन गया था। आँसुओं से उसकी आँखों में बाढ़ आ गयी थी। वाइसराय की तीन हजार की सेना को सम्भाजी महाराज के वीरों ने विनष्ट कर दिया था। बहती हुई मांडवी नदी उसका साक्ष्य दे रही थी। पाँच अभी केवल दस दिन पहले शम्भू महाराज ने फिरंगियों को करारी शिकस्त दी थी। उनके घाव अभी सूखे नहीं थे। वाइसराय की पसलियों का घाव भी अभी भरा नहीं था। फिर भी वह दिखावा कर रहा था कि फिरंगियों का साम्राज्य किस प्रकार अजेय है। इस प्रदर्शन के लिए उसने 25 अक्टूबर, 1683 की रात को चुना। फिरंगियों के इतिहास में इस दिन का बड़ा महत्त्व था। कुछ दशकों पूर्व इसी तिथि को उन्होंने गोवा पर अधिकार किया था। इस शुभ दिन पर पणजी नगर में विजयोत्सव मनाने का सरकारी आदेश दिया गया था। उसी रात राजभवन में शहर के अमीर उमराओं के मनोरंजन के लिए नाच गाने का आयोजन किया गया था। यद्यपि यह सब दिखावा हो रहा था परन्तु कांट दी आल्होर मन ही मन बहुत डर रहा था। पहले उसे मराठों की वीरता और उनकी युद्ध पद्धति का पूर्ण ज्ञान नहीं था। साथ ही उसे अपनी फौजों पर अत्यधिक विश्वास था। एक और बड़ी बात हो गयी थी। शहजादा अकबर का एक वकील अपने मालिक के लिए एक जहाज की माँग करके चला गया था। इस चालाक वकील ने जाते जाते यह सलाह भी दे दी कि, "सम्भाजी की फौज में सभी भगोड़े सिपाहियों का ही जमघट है। उसे अधिक महत्त्व देने की आवश्यकता नहीं है।" कांट अनुभवी और शातिर दिमाग वाला था। इससे पहले उसने स्पेन की लड़ाई में अपनी तलवार का करिश्मा दिखाया था। वहाँ आने से पहले किसी मंगोल नामक स्थान पर उसने गर्वनर का कार्यभार भी सँभाला था। पणजी नगर के चारों ओर पत्थरों से बनी रक्षा दीवार थी। जगह जगह पर मजबूत बुर्ज बने थे। उसके पास गोला बारूद का बड़ा भंडार था। नदी के पास आग्वाद, मूरगाव, काबू रेश द सम्भाजी . 471