छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमागोश जैसे मजबूत किले भी थे। फिर भी मराठों के हाथ उसकी जो दुर्दशा हुई थी। कोंडा में मराठों ने उसका जो हाल किया था उससे कांट अन्दर ही अन्दर टूटता जा रहा था। वाइसराय जितना कुशल प्रशासक था उतना ही चालाक भी। लाभ की बातों का वह स्वयं निर्णय लेता था। कहीं पर हानि की सम्भावना होती थी तो गोवा के राज्य सलाहकार की सहायता लेता था। कल रात को उसने गोवा के अमीर उमराओं अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की एक बैठक किले में आयोजित की थी। इस बैठक में उसने लड़ाई के खर्च के लिए लोगों से तीन लाख अशर्फियों की माँग की थी। बड़े मीठे स्वर और व्याकुल भाव से उसने कहा- "सम्भाजी सेना ने हमारे राज्य में चारों ओर उपद्रव मचा रखा है। उसकी अश्वसेना और थल सेना उत्तर में बसई, दमण, रेवदांडा से लेकर गोवा के पास इस्तेहांव, साष्टी से बार देश तक लूटमार मचा रखी है। हमारे पास पर्याप्त जनशक्ति नहीं है। बार-बार प्रार्थना करने पर भी पुर्तगाल से कोई सहायता नहीं आ रही है। औरंगजेब जैसा कोई मित्र हमारी सहायता करेगा, इसकी भी कोई सम्भावना नहीं दिख रही है। हमारे कुछ फिरंगी सैनिक बड़ी कठिनाई से किलों की रक्षा कर रहे हैं। अपने राज्य को बचाये रखना है तो सेना, शस्त्र और वस्त्र पर धन खर्च करना होगा। इसलिए कृपा करके हमारी सहायता कीजिए।" उस रात बहुत सारा धन एकत्र हुआ। राज्य सलाहकार मंडल ने निर्णय लेकर लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा, "कांट सर के लिए सेना सम्भव हो सके तैयार करो। गोवा के कैदखाने के कैदियों को मुक्त करके उनके हाथों में बन्दूकें पकड़ाओ मराठों के घोड़े मांडवी नदी के पानी में उतरने न पाएँ।" उस रात गुप्तचरों ने समाचार दिया था कि आसपास के जंगलों में कुछ मराठा घुड़सवार छुपते-छुपाते देखे गये हैं। इस खबर से कांट बहुत चिन्तित था। जब नगर में उत्सव चल रहा था, उसी समय गोवा के उत्तर में केवल दो मील की दूरी पर, पूर्वोत्तर दिशा में एक अलग नाटक चल रहा था। पुराने गोवा के उत्तर में मांडवी नदी की दो धारायें बन जाती हैं। उसकी एक धारा के किनारे जुबे द्वीप पर पुर्तगालियों का इस्तेहांव किला था। किले की तटबन्दी प्राचीर ऊँची और बहुत मजबूत थी। पिछली रात से ही शम्भूराजा की फौज आसपास की झाड़ियों, नारियल-सुपारी के बगीचों में छुपकर बैठी थी। घोड़े पर बैठे हुए शम्भू महाराज किले की तटबन्दी की ओर बड़ी उत्सुकता से आँखें फाड़कर देख रहे थे। "महाराज अभी कुछ ही दिन पहले फोंडा किले पर हुई मुठभेड़ में हमने फिरंगियों को दिन में ही तारे दिखा दिये थे। फिर भी उन्हें अकल नहीं आयी ?" 472 :: सम्भाजी