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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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खंडो बल्लाल ने पूछा। “उन्हें हमसे क्या सीखना है? वह तो वे स्वयं निश्चित करेंगे। किन्तु खंडोबा, हाल ही में सूरत से अनाज से लदे कई जहाज गोवा में उतार गये हैं। फिरंगियों की रसद पर मुगल मदमस्त होकर हमारे राज्य को निगल जाना चाहते हैं।” “यह बात तो एकदम सच है, महाराज!” “इसीलिए कह रहा हूँ, इन फिरंगियों पर एक बार और भीषण प्रहार करके इनकी पसलियों को तोड़े बिना, ये चुप नहीं बैठेंगे।” घोड़े की लगाम खींचकर उसकी गर्दन जोर से थपथपाते हुए शम्भू महाराज ने कहा। रात दस बजे समुद्र में भाटा शुरू हुआ। मांडवी का पाट खुल रहा था। उसी का लाभ उठाते हुए शम्भू महाराज तूफान के वेग से घोड़े पर आगे बढ़े। नदी पार करते समय मराठा दल बहुत सावधान था। किसी को कानोंकान मालूम न पड़ सके, इसलिए वे दबे पाँव चल रहे थे। किसी के हाथ में मामूली मशाल तक न थी। नदी के किनारे शम्भू महाराज अपने घोड़े को दुलारते हुए खड़े थे। शम्भू महाराज ने खंडो बल्लाल को आगे बढ़ने का संकेत किया। उसी समय चालीस मराठा घुड़सवार सावधानी से नदी में उतर पड़े। नदी पार करके उन्होंने मध्य रात्रि में ही इस्तेहांव किले को घेर लिया। किले की तटबन्दी ऊँची थी, उस पर चढ़ना बहुत कठिन था। किन्तु मराठा वीर उन पर सहसा टूट पड़े। खंडो बल्लाल की तलवार कलम की तरह तेजी से चलने लगी। फिरंगियों के सिर कटने लगे। आधे घंटे के भीतर ही मराठा वीरों ने किले पर अधिकार कर लिया। खंडो बल्लाल के दल ने किले की एक तोप को दाग दिया। उसकी धुडुमधामऽऽ, धुडुमधाम आवाज सुनकर शम्भूराज प्रसन्न हो गये। विजय का संकेत मिलते ही घने जंगलों में बाहर छुपी मराठा फौज ने उद्घोष किया। तटबन्दी से तोपों की तेज आवाज और उसके साथ 'हर हर महादेव' की गर्जना से गोवा के भीतर हाहाकार मच गया। जगह-जगह पर उत्सव के लिए एकत्र हुए पादरी, ईसाई जिधर से भी रास्ता मिला भागने लगे। तोपों की आवाज से जो सोये हुए थे, वे जग गये। 'आ गये आ गये ..मराठों ने गोवा पर आक्रमण कर दिया है।'-ऐसा चिल्लाते हुए फिरंगी अँधेरे में इधर-उधर टकराने और गिरने लगे। गोवा का हृदय भय से थर्रा उठा। समुद्र तट की सफेद बालू भी भय से काँपने लगी। खाड़ी से बहने वाली हवा शान्त हो गये थी, समुद्री लहरों का नर्तन थम गया था। आस-पास के पेड़-पौधे भेड़-बकरियों की तरह गुमसुम खड़े थे। खतरे का संकेत देने वाली चर्च की घंटियाँ बजने लगीं, नगाड़े भी बजने लगे। सम्भाजी :: 473