छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 476, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंफिरंगी अत्यन्त भयभीत होकर चर्चों में दबी जबान से यीसू का नाम जपने लगे। शहर में घरों की खिड़कियाँ-दरवाजे बन्द होने लगे। हाथों में शस्त्र लिए कुछ लोग शहर के तट की ओर दौड़ पड़े। इनमें कांट द आल्होर सबसे आगे था! 'सर थोड़ा धीरज रखें' ऐसा उसके सहयोगी कह रहे थे। किन्तु एक दिन में दूसरा किला भी मराठों के अधिकार में चले जाने से वाइसराय पागल हो उठा। दूसरे दिन सवेरे- सवेरे अपने सहयोगियों के साथ-साथ शान्त इस्तेहांव के किले की तटबन्दी से भिड़ गया। फिरंगियों की डेढ़ सौ सैनिकों की टुकड़ी ने किले को घेरने का प्रयास किया। उसी समय शम्भू महाराज के नेतृत्व में मराठा सैनिक 'हर हर महादेव' की गर्जना के साथ फिरंगियों पर टूट पड़े। उनका जोश और आवेश ऐसा था कि उनके घोड़े को देखते ही फिरंगी भागने लगे। भागकर मांडवी नदी में कूदने लगे। मराठों का एक तीव्रगामी दल कांट आल्होर का पीछा करते हुए उसके पास पहुँच गया। उनकी नंगी तलवारें देखकर कांट के पैरों के तले की जमीन खिसकने लगी। इसी बीच उसके कुछ घुड़सवार आकर उसे बचाकर लेकर भागे। मांडवी के पानी में बाढ़ आ रही थी। दोनों किनारों पर पानी चढ़ रहा था। किन्तु मराठा वीर फिरंगियों का पीछा करना नहीं छोड़ रहे थे। मराठा वीरों को प्रोत्साहित करते हुए शम्भूमहाराज अपना घोड़ा आगे बढ़ा रहे थे। 'काटो-काटो, मारो-मारो' की गर्जना करते हुए वे मांडवी के बढ़ते रूप को निहार रहे थे। फिरंगी घुड़सवार वाइसराय को खींचते हुए पानी के अन्दर लिए जा रहे थे। बाद में कुछ ऐसी भाग-दौड़ शुरू हुई कि हर फिरंगी अपने शस्त्रों वस्त्रों की चिन्ता किये बिना अपने प्राणों को बचाने में लग गया। सभी फिरंगी नदी की ओर भागे। अनेक फिरंगी कीचड़ में फँस गये। उनमें से अनेक मराठों के बाणों और गोलियों के शिकार हो गये। कुछ पानी में डूबकर मर गये। जैसे मधुमक्खियों ने उनका पीछा करके बुरी तरह काटना शुरू किया हो। उसी तरह मराठों ने फिरंगियों को सताना आरम्भ किया। वाइसराय का भाग्य अच्छा था। उसे एक छोटी किश्ती का सहारा मिल गया। उस छोटी नाव में बैठकर भय से काँपता हुआ वाइसराय आधी नदी को पार कर चुका था। उसी समय मांडवी के दूसरे तट पर पहुँचे कुछ फिरंगी पानी से लबालब भरे बाँध को काटने लगे। परिणामस्वरूप नदी का पानी वेग से बढ़ने लगा। पानी से उठने वाली खलखलाहट की आवाज बाहर भी सुनी जा रही थी। पानी बढ़ता जा रहा था। शम्भूराजा निराश भाव से वाइसराय की आगे बढ़ती नाव को देख रहे थे। शिकार हाथ से निकला जा रहा था। शम्भूराजा को जीवित रूप में बादशाह औरंगजेब के हवाले करने की योजना बनाने वाला शत्रु उन्हें चकमा देकर भाग रहा था। शम्भू महाराज का मन उद्विग्न होने लगा। उनकी दृष्टि नदी के उस ओर गोवा पर पड़ी। 474 :: सम्भाजी