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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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वहाँ के चर्चों की ऊँची लाल आकृतियाँ, सुन्दर कमानें शम्भू महाराज के वीर हृदय को पुकारने लगीं। फिरंगी भीतर से टूट चुके थे। आगे बढ़कर गोवा पर अधिकार करने का यही सुअवसर था। गोवा हिन्दुस्तान के विदेश व्यापार की कुंजी थी। यह कुंजी कई बार शिवाजी महाराज के हाथ से निकल चुकी थी। इस अवसर को खोना वस्तुतः मूर्खता ही कही जाती। नदी के एक तट पर महाराज खड़े थे। उनके हाथ युद्ध के लिए बेचैन हो रहे थे। वीरत्व के आवेश से हृदय की धड़कन बढ़ गयी थी। अपनी सबल हथेली से उन्होंने घोड़े का कन्धा थपथपाया। घोड़े के एड़ लगाकर उन्होंने गर्जना की "चलो।" घोड़े के मुँह में लगाम के काँटे चुभने लगे। घोड़ा जोर-जोर से हिनहिनाने लगा। उसने सामने का भयंकर जल प्रवाह देख लिया था। इसलिए वह किनारे पर ही खड़ा हो गया था। दूसरे क्षण महाराज ने उसके पुट्ठे पर प्रहार किया। लगाम को उन्होंने इतने जोर से खींचा की घोड़े के मुख को गहरा आघात लगा और वह कराह उठा। उसे एक प्राणान्तक छींक आयी। अपने मालिक के आदेश का पालन करने के लिए वह बहादुर अश्व पानी में कूद पड़ा। पानी की पर्वताकार लहरों में घोड़े ने प्रवेश किया। पानी इतना अधिक और वेगवान था कि घोड़े का पैर टिकना असम्भव हो गया। पैर टिकते नहीं थे और ऊपर उड़ने के लिए पंख तो थे नहीं। तेज लहरों के कारण उसका तैरना भी कठिन हो गया। फिर भी शम्भू महाराज ने घोड़े को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने अपने दोनों पैरों से घोड़े को दबाकर रखा था। उस पर जोर जोर से प्रहार करते हुए 'चल चल' की गर्जना कर रहे थे। परन्तु पानी के बढ़ते वेगवान प्रवाह के आगे घोड़े की एक न चल पायी। घोड़े की नाक में पानी घुसने लगा। ऊँची ऊँची लहरों के तेज आघात भी उसे झेलने पड़ रहे थे। जैसे कोई सूखी लकड़ी पानी के बहाव में उलट पुलट होती है उसी प्रकार वह घोड़ा भी पानी में पलटी मारकर एक ओर झुक गया। शम्भू महाराज अपने को घोड़े से अलग करने का प्रयास करने लगे। वे हाथ-पाँव मारकर ऊपर आते थे और उसी वेग से गोता लगा लेते थे। किनारे पर खड़े सैनिक यह दृश्य देखकर जोर जोर से चिल्ला रहे थे। शम्भूमहाराज का दुर्भाग्य यह था कि उनका एक पैर रिकेब में फँस गया था। किनारे पर हाहाकार मच गया। भीड़ से आगे आकर खंडो बल्लाल ने यह दृश्य देखा। मराठों के परमप्रिय, शिवपुत्र और रामगढ़ के राजेश्वर को काल उनकी आँखों के सामने से लिए जा रहा था। यह दृश्य देखकर खंडोजी की धमनियों में प्रवाहित स्वामिभक्ति का खून खौल पड़ा—'महाराज, महाराज, शम्भूमहाराज' चिल्लाते हुए अपने पाखर घोड़े के सम्भाजी · 475