भारतकोश
छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 478, कुल 793 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 478

साथ वे नदी के कूद पड़े। जब उनके घोड़े के भी पैर उखड़ गये तो खंडोजी ने पानी में छलाँग लगा दी। पानी में रास्ता बनाते हुए खंडोजी महाराज की ओर बढ़ रहे थे। इस समय तक महाराज ने कई गोते खा लिए थे। वे अव्वल दर्जे के तैराक थे। शेर से भी लड़ जाने की उनमें शक्ति थी। किन्तु उनका घोड़ा अर्धमृत अवस्था में तैर रहा था और महराज का पैर रिकेब में फँस गया था। मुँह और नाक में अनेक बार पानी चले जाने के कारण उनकी आँखें सफेद हो चुकी थीं। महाराज ने खंडोजी को जोश के साथ अपनी ओर बढ़ते देख लिया। उन्होंने चिल्लाकर कहा, "अरे खंडो, रिकेब की डोर काट दो उसमें मेरा पैर अटक गया है। खंडोजी ने तत्काल कमर से छुरी निकाली और उछलकर आगे बढ़े। पानी में डूबकर रिकेब की डोर काटते हुए उन्होंने भी दो-तीन गोते लगाए। सौभाग्य से सफलता हाथ लगी। खंडोजी ने महाराज को सहारा दिया। लहरों का सामना करते हुए खंडोजी के घोड़े की लगाम का सहारा लेकर बड़ी कठिनाई से दोनों किनारे पहुँचे। शम्भूमहाराज और खंडोजी अत्यधिक थकी हुई अवस्था में किनारे की बालू तक पहुँचे और शरीर से टपकते पानी के साथ वहीं बैठ गये। बहुत देर तक उनकी साँसें तेजी से चलती रहीं। पानी के भीतर चल रहे उस युद्ध को देखकर सभी घुड़सवार और घोड़े भी सकते में आ गये थे। यहाँ तक कि पंछी भी अपने पंखों को समेटकरु नीड़ों में छुप गये थे। मराठों के अधिकार में आया सांत इस्तेहांव का किला रात की शीतल हवाओं से भरे अँधेरे में गुमसुम खड़ा था। क़िले में शम्भूमहाराज और उनके साथी रुके हुए थे। बीच के आँगन में कुछ परिचारकों ने आग जला रखी थी। रायप्पा ने आग में बड़ी-बड़ी लकड़ियाँ डाल रखी थीं। आग में लकड़ी रह-रह कर धधक उठती थी। उसका गेरूआ प्रकाश अपनी ऊष्णता के साथ चारों ओर फैल रहा था। गरम और कशीदाकारी की हुई शाल लपेटे शम्भू महाराज आग के पास बैठे थे। उनके साथ ही कवि कलश, जोत्याजी केसकर आदि भी थे किन्तु उन्होंने खंडोजी बल्लाल को अपने बहुत करीब बैठाया था। समुद्र के खारे पानी में गोते खाते हुए अनेक बार उनके मुँह और नाक में पानी गया था। परिणामस्वरूप उनका सिर भारी हो रहा था। आग और ऊष्णता की उन्हें अत्यधिक आवश्यकता थी। महाराज ने वहीं पर भोजन ग्रहण किया। उनके साथियों का भोजन भी हो चुका था। शम्भू महाराज ने उठकर खंडो बल्लाल का मस्तक अपनी गोद में ले लिया। उसकी पीठ पर प्यार की थपकी देते हुए बोले- "खंडोबा आज मराठों का राजकलश पानी में नहीं समुद्र के तल में पहुँच गया था। अपने प्राणों की चिन्ता न करते हुए आपने पानी में छलाँग लगाई। आपके 476 :: सम्भाजी