भारतकोश
छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 479, कुल 793 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 479

इस दुर्लभ जयकार के सामने मैं नतमस्तक हूँ। आपकी योग्यता को पहचानकर हिंदवी स्वराज्य सम्मानित चिटणीस पद तो हम आपको पहले ही दे चुके थे। और कुछ चाहिए तो बताइये।" स्वाभिमान खंडो बल्लाल ने उठकर शम्भूमहाराज के पैर पकड़ लिए। उन्होंने कहा, "आपके चरणों में मेरा जो स्थान है, उसे अबाधित बनाए रखें। इससे अधिक मुझे कुछ नहीं चाहिए।" खंडोजी ने उसी समय अपना पाखर घोड़ा शम्भूमहाराज को देने का आग्रह किया। इस बात से शम्भूमहाराज उन पर पूरी तरह रीझ गय। उन्होंने कहा, "अरे खंडोबा, हमें और कितना लज्जित करना चाहते हो? क्या जन्म-जन्मान्तर तक के लिए उपकार का बोझ मेरे सिर पर रखकर पुरस्कार भी मुझे ही देना चाहते हो?" भावना के आवेश में शम्भूमहाराज के नेत्र चमक रहे थे। शब्दों में मन्दिर के घंटा नाद का प्रभाव आ गया था। खंडो बल्लाल को अपनी बाँहों में भरते हुए शम्भूमहाराज ने कहा, "हमारे पिताजी हर किले के जमादारखाने की चाभियाँ प्रभु जमात के लोगों को सौंपकर चिन्तामुक्त हो जाते थे। उसका सही कारण मैं आज समझ पाया हूँ। मराठा हो या ब्राह्मण, शिवाजी और सम्भाजी के समय में महाराष्ट्र की धरती ने अनेक जातियाँ और उपजातियाँ देखी हैं, उनके रंग पहचाने हैं। अनेक बार ये जातियाँ अपने जातीय गुण के अनुसार ही व्यवहार करती हैं। खंडोबा आपके पिता की, बालाजी चिटणीस की राजनिष्ठा तो हीरे मोती की तरह प्रकाशवान है ही, किन्तु गजापुर खंडहर में अपने स्वामी के लिए खून से नहाने वाला बाजी प्रभु, पुरन्दर का वीर सेनानी मुरारबाजी अथवा समुद्र के गर्भ को चीरकर, शेषनाग की चोटी खींचकर पाताल लोक से सम्भाजी जैसे अपने स्वामी को ले जाने वाला खंडोजी बल्लाल हो, सभी राजनिष्ठा के बेजोड़ उदाहरण हैं। आपकी प्रभु जाति ने 'राजनिष्ठा' शब्द को इतनी ऊँचाई प्रदान कर दी है कि ऊपर के उस प्रभु ने भी आपको हजार बार वन्दन किया तो अत्युक्ति न होगी। ऐसी विलक्षण आपकी योग्यता है।" छह गोवा का समुद्र तट और वन प्रदेश निस्तब्ध था। युद्ध के बाद की भयावह शान्ति चारों ओर छायी थी। घने जंगल की आड़ में पणजी शहर किसी गुमसुम बैठे जानवर की तरह लग रहा था। शम्भूमहाराज का पड़ाव डिचोली में था। दो हजार सैनिकों सम्भाजी :: 477