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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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शिकायतों को दूर करने का। वह आवश्यक है। " अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए मोरोपन्त ने अण्णाजी से कहा, "कुछ दिन पहले विशालगढ़ के कुछ लोग उनसे मिले। एक झरने पर बड़ा बाँध बाँधकर पानी को घुमाकर खेती के लिए उपयोग में लाने की माँग कर रहे थे। युवराज उसे उत्साहपूर्वक स्वीकार कर लिए। चलता है अण्णाजी! जब नया खून कार्यभार उठाता है तो उसकी उड़ान भी फौवारे की तरह उछलती रहती है। हम जैसे बुजुर्गों को दो कदम पीछे हटकर उन्हें रास्ता देना चाहिए।" अण्णाजी दिल खोलकर हँसे। युवराज का उपहास करते कहने लगे— "अच्छा! तो अब झरनों के बहने की दिशा भी बदल देंगे। कल बहती नदियों पर बाँध बाँधकर पानी रोकने की बात करेंगे।" "इतने विस्तार से तो मुझे कुछ नहीं ज्ञात है। किन्तु कर्नाटक की लड़ाई में शम्भूराजा अनेक नयी कल्पनाओं और योजनाओं को लेकर महाराज के साथ विचार विमर्श करने वाले हैं।" "चलता है। हमारे युवराज को कवि कलश के साथ रहकर कविता का रोग लग गया है। कवियों और बैलों का दिमाग अलग अलग रहता है परन्तु उद्देश्य दोनों का एक ही होता है। एक कागज के साथ खेलता है तो दूसरा सींग से मिट्टी उखाड़ता है। सारा श्रम व्यर्थ।" मोरोपन्त खास दरबार की ओर चले गये। किन्तु अण्णाजी के मस्तिष्क में एक ही विचार मन्थन चल रहा था। उन्हें चार दिन पहले की बात याद आ गयी। उस समय दरबार में कार्य में व्यस्त शिवाजी महाराज से मोरोपन्त ने प्रश्न किया था— "महाराज! कर्नाटक की लड़ाई में शम्भूराजा तो जाएँगे न?" शिवाजी महाराज ने पेशवा की ओर चौंककर देखा। तब उन्होंने हँसते हुए उत्तर दिया—"मोरोपन्त अपनी सहायता के लिए भविष्य में तैयार होने वाले युवराज को राजा युद्ध में नहीं ले जाएगा तो क्या उसको घर में मुर्गी की तरह बन्द रखेगा?" "युद्ध की तैयारी करने, योजना बनाने और राजकीय कार्य व्यापार की विभिन्न स्थितियों का ज्ञान युवराज को उचित उम्र में नहीं होना चाहिए क्या?" बालाजी आवजी बीच में ही बोल पड़े। बिना पूछे ही बालाजी का बोलना अण्णाजी दत्तो को अच्छा नहीं लग रहा था। जिस संकट का अण्णाजी को भय था, वही घटित होने जा रहा था। कर्नाटक युद्ध में युवराज संभाजी को साथ ले जाने के लिए महाराज ने निश्चय कर लिया था। अण्णाजी के विचार से यहीं से दुष्टचक्र का आरम्भ होने वाला था। हजारों की भीड़ सम्भाजी :: 47