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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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में शम्भूराजा का व्यक्तित्व चमकने वाला था। युद्ध में तलवार भाँजेंगे, बातचीत में हीरे की तरह चमकेंगे। भविष्य की बात सोचकर अण्णाजी अपना धीरज खो बैठे। दरबार में उनसे और अधिक रुका न गया। वे तेज गति से बाहर निकले। उनके पाँव उन्हें सोयराबाई के महल की ओर खींचे लिए जा रहे थे। अष्टप्रधानों में अण्णाजी एक प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। लम्बे शरीर, मजबूत कद काठी, साँवले रंग, सिर पर तिरछी पगड़ी, कानों में झूमती मोतियों की बाली, शानदार चाल वाले अण्णाजी दरबार की शोभा थे। वे संगमेश्वर के कुलकर्णी परिवार के थे। उन पर शिवाजी महाराज की नजर पड़ी और उनके जीवन में परिवर्तन आ गया। वे हिन्दवी स्वराज्य के सुरनवीस बन गये। महाराज के निजी पत्राचार, राजनीति सम्बन्धी कार्य, महसूल की वसूली जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य उन्हीं के पास थे। स्वराज्य की भूमि व्यवस्था का काम भी वही देखते थे। छोटी से छोटी त्रुटि भी उनकी नजर से छूटती नहीं थी। अण्णाजी का आतंक इतना भयानक था कि उनके नाम से ही लिपिक और अधिकारी भय से काँप उठते थे। अण्णाजी ने स्वराज्य के लिए कुछ कम परिश्रम नहीं किया था। पन्हाला और रांगणा किला जीतने के लिए अण्णाजी ने स्वयं तलवार चलाई थी। कोंकण प्रान्त में स्वराज्य की व्यवस्था करने के लिए उन्होंने घोर परिश्रम किया था। उसी श्रम के पुरस्कार के रूप में महाराज ने दक्षिण कोंकण का दाभोल, राजापुर कुडाल से लेकर फोंडा तक का सारा प्रशासनिक कार्यभार उन्हीं को सौंप दिया था। रायगढ़ के राजकीय कार्य व्यापार में अण्णाजी का स्थान एक किले की ही तरह मजबूत था। संभाजी स्वभाव से मुँहतोड़ जवाब देने वाले व्यक्ति थे। युवावस्था के कारण अपेक्षाकृत निश्चिन्त भी थे। यहाँ तक तो ठीक था। किन्तु शम्भूराजा के तीखे स्वभाव की आग जब प्रमुख कर्मचारियों को लगने लगी तो अण्णाजी पूरी तरह सावधान हो गये। शिवाजी महाराज को मिलने के लिए रायगढ़ जब कोई अंग्रेज, डच या पुर्तगाली आते थे तो महाराज के साथ ही मोरोपन्त, अण्णाजी और राहूजी सोमनाथ इन तीनों के लिए भी उपहार ले आना नहीं भूलते थे। यदि द्रव्य थोड़ा भी कम हुआ तो अण्णाजी बहुत क्रुद्ध होते थे। कभी कभी इस प्रकार वसूली के लिए अपने कर्मचारियों को चुपके से फिरंगियों की कोठी तक भेज देते थे। दक्षिण कोंकण से आने वाली वसूली में अनेक बार कम रकम दिखाई जाती थी। अण्णाजी के कृपापात्र अनेक लिपिक और वरिष्ठ लिपिक तो वहाँ थे ही। सत्ता भी जब अचार की तरह पुरानी हो जाती है तो अधिकारियों के मुँह में भी पानी आने लगता है। शिवाजी महाराज को ज्ञात था कि इस प्रकार की गड़बड़ियाँ राज्य में चल रही हैं। परन्तु प्रमुख लिपिक की उम्र, उनके अनुभव, पहले के कार्य 48 सम्भाजी