छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंका पीछा करने में मराठों के साथ हो गये। गाँव के सामान्य कुत्तों के साथ गड़ेरियों के पालतू कुत्ते भी मुगलों के पीछे दौड़ पड़े। खेतों की ऊँची नीची जमीन में दौड़ते हुए मुगलों के घोड़े भी जगह जगह पर गिरने लगे। मुगलों के एक के बाद एक सिर कटने लगे। 'अल्लाऽऽ' 'खुदाऽऽ' 'भागोऽऽ' ऐसी चिल्लाहट सुनाई पड़ने लगी। मराठा सेना मुगलों का पीछा करते करते ताम्हिणी घाट की तलहटी तक पहुँच गयी। मुगलों की बची-खुची सेना घने जंगलों में छिप गयी। थके हुए मराठा सैनिक रुक गये। घोड़े सूखी घास खाने लगे। साईसों ने घोड़ों को चने खिलाने शुरू किये। घुड़सवारों ने चने के साथ गुड़ और मूँगफलियाँ खड़े खड़े ही खाया और पास के झरने से पानी पीकर पूरी तरह तृप्त हो गये। तब तक कविराज ने कुछ सूचनाएँ प्राप्त कर ली थीं। कुशल सैनिकों ने अपने हाथों में मशालें लीं और सामने के घने जंगल में घुसने का निर्णय लिया। आसपास के ग्रामीण, दर्शक और कुछ राहगीर भी मराठों के साथ हो लिये। जिस प्रकार शिकारी हाँका लगाकर बाघ को उठाते और फँसाते हैं, उसी प्रकार मराठा सेना आगे बढ़ रही थी। कवि कलश की दृष्टि कुछ खोज रही थी। उन्होंने एक नाले में पानी का बहता प्रवाह देख लिया। मशाल के प्रकाश में उन्होंने मार्ग ढूँढ़ा। काफी दूर जाने पर नाले का एक विस्तृत क्षेत्र मिला। वहाँ पानी की धारा की बगल में मुगलों का रसद भंडार था। उसमें अनाज की बोरियाँ, जानवरों के चारे और बारूद के भंडार थे। उन सभी को कलश जी ने अपने क़ब्जे में ले लिया। मुगल ऊपर के घने जंगल में छुप गये थे। लूटी हुई रसद के साथ सेना निजामपुर के समीप आ गयी। अब तक रात बहुत हो चुकी थी। चौकी पर एकत्र होकर सभी ने निर्णय लिया कि दूसरे दिन घाट में जाएँगे। पास की एक घाटी को पार करके कविराज की सेना मैदान में आ गयी। किसी ने चिल्लाकर कहा, "कविराज! उधर देखिए।" सभी की निगाहें एकाएक मुड़ गयीं। ताम्हिणी घाट की ऊँची पहाड़ियाँ वहाँ से स्पष्ट दिखाई पड़ रही थीं। सितारों की छाया में मुगलों के घोड़े दबे पाँव आगे बढ़ते दिखाई दे रहे थे। एक ने कहा, "कविराज, वह देखिए! खान डरकर घाट पर चला गया।" "जाएगा ही! उसकी सारी रसद हमारे क़ब्जे में आ गयी है, तो वह रुकेगा कैसे?" सभी लोग कविराज की प्रशंसा करने लगे, "कविराज, आज आपके शरीर में भवानी का संचार हो गया था क्या?" ऐसा पूछकर, उनकी मुक्तकंठ से प्रशंसा करने लगे। उस समय अखाड़ेबाजी से मजबूत बनी अपनी भुजाओं और छाती को गर्व से फुलाते हुए कविराज ने गर्व से कहा, "साथियो, किसी पागल हाथी को काबू में करना आसान है किन्तु किसी क्रुद्ध ब्राह्मण पर काबू पाना बहुत कठिन है।" सम्भाजी .. 497