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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 500, कुल 793 में से

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कविराज का घोड़ा निजामपुर पहुँच गया। ग्रामवासियों और घुड़सवारों की बड़ी भीड़ लग गयी थी। दूसरी ओर की एक घाटी में कलश की सेना को एक जीवित व्यक्ति मिला था। यह औरंगजेब का सरदार था। उसके हाथ-पैर बाँधकर ग्राम पंचायत में खम्भे से बाँधा गया था। वहाँ पर सभी लोग कविराज की प्रतीक्षा कर रहे थे। उनके आते ही लोग चिल्लाने लगे- "कविराज, इस राक्षस का सिर धड़ से अलग कर दीजिए। शीघ्र ही इसका खात्मा कीजिए।" घबराये हुए लगभग पैंतीस वर्ष के गोरे चिट्टे खान की ओर कलश जी ने देखा। गरजते हुए उससे पूछा, "तेरा नाम क्या है?" "दुखलास खान हुजूर ऽऽ।" शिकार बड़ा था और नामचीन भी। कवि कलश ने उसके हाथ-पैर खोलने का आदेश दिया। मुक्त हुए खान ने कविराज के पैर पकड़ लिये। अपने प्राण बचाने के लिए वह दया की याचना करने लगा। "कविराज ऽ मारिए, मारिए इस शैतान को, नहीं तो हमीं इसके रक्त से अपनी तलवार लाल करेंगे।" घुड़सवार सैनिकों को बहुत क्रोध आ रहा था। कलश ने हाथ के संकेत से सभी को शान्त रहने को कहा। उन्होंने दुखलास खान से कहा, "चल उठ भाग, भाग जा अपनी फौज की ओर।" दुखलास खान अविश्वास मे और मराठा सैनिक असन्तोष मिश्रित आश्चर्य से कविराज की ओर देखने लगे। तब कविराज ने कड़ककर कहा, "केवल एक काम के लिए तुम्हें मुक्त कर रहा हूँ। बादशाह के पास तुम्हें जीवित भेज रहा हूँ।" "हुजूर, हुजूर हुक्मऽऽ"-पैर पकड़ते हुए दुखलास खान पूछने लगा। कविराज ने डाँटते हुए कहा, "जाओ, जाकर कहो अपने उस मूर्ख बादशाह से-तैमूरलंग के ग्यारहवें वंशज होने का अभिमान न करे। आक्रमण के नाम पर 'बैं-बैं' करती मामूली भेड़-बकरियों को सह्याद्रि के बब्बर शेरों के पास न भेजें। हमारे शम्भुमहाराज जब तक रायगढ़ के सिंहासन पर बैठे हैं, उसी समय में औरंगजेब को रायगढ़ के आस पास आकर लौट जाने के लिए कहो। केवल एक बार उसे यहाँ आने को कहो।" 498 :: सम्भाजी