छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरने का आरोप लगाया गया था। वसन्त पंचमी के त्योहार के दिन राजमहल में आयी एक ब्राह्मण कन्या के साथ अत्याचार करने का आरोप। वह भी दिन दहाड़े। वह कन्या भी किसी ऐरे-गैरे की नहीं, अष्टप्रधानों में से तीन क्रमांक के अधिकारी सुरनबीस अण्णाजी दत्तो की लाड़ली कन्या। सोयराबाई स्मृति भ्रमित हो गयी थीं। बड़े महाराज द्वारा दिये गये दायित्व को उन्होंने बड़ी निष्ठा से पूरा किया था। मूल प्रश्न यह था कि जब सभी बहू-बेटियाँ वसन्त पंचमी के उत्सव के लिए अन्तःपुर में एकत्र थीं तो हंसा उन सभी को छोड़कर दो महलों को छोड़कर तीसरे महल में क्यों गयी? सोयराबाई ने पहरेदारों, खिदमतदारों, महल की दासियों आदि सभी की साक्षी ली। दुख से विह्वल हंसा की माँ से भी मिली और उन्हें सान्त्वना दी। जिस कुएँ में हंसा ने आत्महत्या की थी उसका भी मुआयना किया। अन्त में उन्होंने शम्भूराजा को उपस्थित होने का आदेश दिया। आरम्भ में युवराज कुछ भी बोलने के लिए तैयार न थे। अन्त में वे इतना ही बोले, “माताजी, हमारे हर महल के आसपास इतने मन्दिर हैं, तुलसी के वृंदावन हैं, इतना ही नहीं हर दरवाजे की चौखट के साथ श्री गणेशजी की मूर्ति रखी है, हर गवाक्ष में भगवान प्रस्तर की मूर्तियाँ विराजमान हैं। इतने मंगलमय वातावरण और उसकी पवित्रता को हम कैसे भूल सकते हैं?” “किन्तु शम्भूराजा! तुम पर जो आरोप लगाया गया है वह सच है, या झूठ? इसी का स्पष्ट उत्तर दो।” “आप इस तरह पूछ ही कैसे सकती हैं, माताजी? इधर-उधर हजारों लोगों की भीड़ में दिन दहाड़े किसी जवान युवती को अपने पलंग पर खींचने वाले क्या हम कौवों की औलाद हैं? मैं सिंह का बच्चा हूँ, जंगल का तोता हूँ।” सोयराबाई ने सारे बयान दर्ज कर लिए। साथ में बालाजी चिटणीस तो थे ही। उन्हीं के द्वारा सारा वृत्तान्त लिखकर तैयार हुआ। जब महाराजा ने सारे विवरण पर निगाह दौड़ाई तो एक लम्बी साँस लेकर राहत का अनुभव किया। महाराज ने सोयराबाई से केवल इतना पूछा, “रानी साहब यदि वास्तव में इस प्रकार का पाप घटित हुआ होता तो आप क्या करतीं?” बिना एक क्षण रुके और बिना महाराज को देखे सोयराबाई ने कहा, “युगप्रवर्तक और पुण्यवान पिता ऐसा बदनाम पुत्र देखकर हमें अत्यन्त क्षोभ होता। मैंने महाराज से अनुरोध किया होता कि ऐसे अपराध के लिए किसी ऊँची पहाड़ी से खाई में गिरा देने का नया नियम बनायें।” इस उद्गार से महाराज प्रसन्नतापूर्वक हँसे। सोयराबाई कुछ अचकचा गयीं। उन्होंने महाराज से पूछा, “दरबार में प्रह्लाद निराजी और काजी हैदर जैसे बड़े- बड़े न्यायाधीश के होते हुए इस जाँच का कार्य आपने मुझे क्यों सौंपा?” 50 :: सम्भाजी