छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहाराज मन्द-मन्द मुस्कराते हुए बोले, "एक तो यह घटना ही बहुत संवेदनशील थी। दूसरे आप शम्भू की सौतेली माँ। इसलिए मुझे विश्वास था कि आरोपी के प्रति जरा भी सहानुभूति रखे बिना आप कठोरता से पूछताछ करेंगी। इससे जो सच्चाई होगी वह अन्त में सामने आ जाएगी। इसलिए आपको यह दायित्व सौंपा।" वे सारी बातें सोयराबाई को स्मरण हो आयीं। वह अण्णाजी से स्पष्ट शब्दों में बोली, "हंसा ने एकतरफा प्यार में असफल होने के कारण कुएँ में कूदकर आत्महत्या की। अपना यह अनुमान मुझे आज भी सत्य लगता है, पन्त।" "देखिए महारानी जी! शम्भूराजा नाम के युवराज के लिए मेरी बेटी अकारण अपनी जिन्दगी से हाथ धो बैठी। यही शम्भू हमारे सारे विनाश की जड़ है, यही शम्भू हमारा घातक है। इस बात को मैं अपनी आखिरी साँस तक नहीं भूल सकता।" "फिर मुझे क्या करना चाहिए था, पन्त?" "महारानी जी, भविष्य में बनने वाली राजमाता के जरीदार वस्त्रों और मंगल शहनाई की थोड़ी भी याद की होती तो आपके हाथ में आयी न्याय के तराजू की डंडी सही दिशा में झुक गयी होती।" बहुत समय तक दोनों में बातचीत होती रही। अन्त में थके हुए अण्णाजी अलसाते हुए उठे। धीमी आवाज में सोयराबाई से बोले, "देखिए महारानी जी, आप ही सोचिए। यदि शम्भूराजा कर्नाटक गये तो लड़ाई में बहादुरी दिखाएँगे और महाराज की नाक का बाल बनेंगे।" "परन्तु अण्णाजी पन्त, इस सम्बन्ध में महाराज के साथ मेरी बात हो चुकी है। वे शम्भूराजा को साथ ले जाने का निश्चय कर चुके हैं। उनका मन बदलना कठिन है।" "क्यों?" महाराज ने कहा, "जैसे रात के पीछे दिन दौड़ता है, उसी तरह राजा के साथ युवराज का युद्ध पर जाना योग्य और आवश्यक है। कल राज्य का कार्य भार युवराज को ही सँभालना है।" "अच्छा। इसका मतलब बड़े महाराज ने एक बार उत्तर दे ही दिया है, तो?" अण्णाजी ने पहेली सुलझाई। उस समय सोयराबाई की सारी हिम्मत समाप्त हो चुकी थी। वे पत्थर की मूर्ति जैसी चुपचाप बैठी थीं। उनके समीप सरककर अण्णाजी बोले, "यदि आपको स्मरण हो तो एक बार महाराज के मन में कर्नाटक राज्य और रायगढ़ राज्य ऐसे हिन्दवी राज्य के बँटवारे का विचार आया था। आप सम्भाजी :: 51