छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआलमगीर की तलवार में कितनी धार है ? यह इन जहन्नमियों को दिखाना ही पड़ेगा।" बादशाह के इस वक्तव्य से दरबार में सन्नाटा छा गया। इसी समय कोने का पर्दा हिला। काँच की दंडियों की खनक के साथ एक कोमल और आवाज सुनाई पड़ी। "लेकिन खाविन्द आज सारी दुनिया में एक ईरान के बादशाह को छोड़कर आपके अतिरिक्त इस्लाम का रखवाला दूसरा है कौन ?" "कौन ?" सभी की दृष्टि उसी ओर घूम गयी। बादशाह की लाडली शहजादी जीनतउन्निसा वहाँ खड़ी थी। उसके जालीदार घूँघट में उसका गोरा और तेजस्वी चेहरा दमक रहा था। बादशाह तुरन्त उठकर खड़ा हो गया। अपने दरबारी कामकाज में घर की बहू बेगमों और शहजादियों की दखलन्दाजी उसे बिलकुल पसन्द न थी। लेकिन उसकी प्रिय शहजादी के अचानक ऐसी भूल करने से वह बहुत दुखी हुआ। वह दरबार में रुका नहीं। क्रोध से पैर पटकते हुए वह अपने निजी कक्ष में पहुँच गया। शेख काजी जैसे धर्मात्मा को टक्कर देने वाला बादशाह अपनी शहजादी की मूर्खता से बहुत दुखी हो गया था। उसके पीछे-पीछे जीनतउन्निसा भी घबराई हुई भागी भागी आयी। उदयपुरी बेगम और औरंगाबादी बेगम के साथ सभी बेगमे घबरा गयी थीं। बादशाह के चेहरे का रंग एकदम बदल गया था। रात को खाना खाते समय बादशाह ने पूछा, "बेटी, आज दोपहर को तुम्हें क्या हो गया था ?" "अब्बाजान, मैं तो अपने मजहब के लिए बोली थी।" "बेटी जीनत, तुम्हें मालूम है कि नहीं, जेबुन्निसा मेरी कितनी प्रिय शहजादी थी ? पर उस मूर्ख शहजादा अकबर के बहकावे में आकर हमेशा के लिए उस सलीमगढ़ की अँधेरी कोठरी में कैद हो गयी। शहजादी होकर भी राजनीति के कार्यक्षेत्र में दखलन्दाजी क्यों करती हो ?" किसी अज्ञात भय के कारण बादशाह के चेहरे का रंग उड़ गया। उसने कातर स्वर में कहा, "बेटी जीनत, आज मैं सिर्फ इतना बताना चाहता हूँ कि मैं अपनी एक और शहजादी हमेशा के लिए खोना नहीं चाहता।" "रहम करो। अब्बा रहम करो।" शहजादी ने हाथ जोड़ लिये। "मुझे लगा आपको मुहब्बत हो गयी है।" "कैसी मुहब्बत, अब्बाजान ?" "उस काफिर के लिए, सम्भा के लिए।" बादशाह ने अपनी नजरें शहजादी पर गड़ा दीं। "वह तो मुझसे पन्द्रह-बीस साल छोटा है, मेरे भाई जैसा है।" सम्भाजी : 521