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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 540, कुल 793 में से

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की मिट्टी स्वराज्य पर आये घोर संकट को जानती थी। पिछले सात वर्षों से उसका लाड़ला युवराज कलिकाल से जूझ रहा था। इस व्यथा का उसे पूरा ज्ञान था। अकाल की भीषणता ने सामान्य व्यक्तियों की कमर तोड़ दी थी। किन्तु षड्यन्त्रकारी कर्मचारी उत्साहित थे। महाराष्ट्र के जमींदार जागीरदार औरंगजेब से मिल रहे थे। उन्हें सिर पर उठाकर औरंगजेब नाच रहा था। जिनमें कोई पात्रता नहीं थी, उन्हें भी बड़ा सम्मान दे रहा था। जागीर के झूठे कागजपत्र बनाने में उसके बाप का क्या बिगड़ता था ? राजधानी रायगढ़ पर भी पानी का संकट उपस्थित हो गया था। पहले ही किले पर नीचे से परवालों में ढोकर पानी लाया जाता था। किले की विशेष जरूरत के लिए कुछ घोड़े छोड़कर शेष घोड़े पाचाड़, रायगढ़वाड़ी और छत्री निजामपुर ले जाये गये थे। समीप की काल नदी भी पूरी तरह सूख गयी थी। उसकी बीच धारा में बड़े-बड़े गड्ढे खोदकर उसमें अपने अपने घड़े और मसकें भरकर लोग ले जाते थे। पानी भरी पखाल लेकर सीढ़ियाँ चढ़ते चढ़ते भिश्तियों की कमर टेढ़ी हो रही थी। काला हौद, पुष्करिणी और गंगासागर भी सूख गये थे। शम्भूमहाराज और महारानी येसूबाई बहुत चिन्तित थे। चिन्ता के कारण महाराज का शरीर सूखता जा रहा था। व्याकुल होकर महारानी ने कहा, "हे भगवान, हे जगदीश्वर, हे माँ भवानी, कब बदलेगा यह दिन?" लोगों की दशा देखकर महाराज का कलेजा विदीर्ण हो रहा था। भारी मन से उन्होंने कहा, "येसूरानी हमारी जनता छः-सात वर्ष तक मुगलों का सामना करती रही किन्तु उससे बच गयी। वह लड़ाई भी जानलेवा थी। आज हमारे सामने कितना बुरा दिन आया है। लोगों के तबेले नष्ट हो रहे हैं। स्वराज्य में पानी नहीं। अब तो हमारी आँखों का पानी भी सूखता जा रहा है। अब एक बूँद आँसू भी नहीं निकलते, माँ भवानी अपने बच्चों की कैसी परीक्षा ले रही हैं?" "महाराज थोड़ा धैर्य धारण करें। जिंजी से हरजाँ राजा की अनाज मे भरी गाड़ियाँ आ जाएँगी।" येसूबाई ने धीरज बँधाते हुए कहा। "किन्तु महारानी, बार-बार स्मरण कराने पर भी उनकी ओर से सहायता क्यों नहीं आ रही है?" "दूर की यात्रा है रसद आने में देर तो लगेगी।" "नहीं येसूरानी, मुझे सन्देह हो रहा है। अकाल तो अब आया है किन्तु हमारे अपने घर के लोगों ने तो मुझे कब से पराया समझ लिया है। हमारे दो बहनोइयों ने जो किया है, हरजी राजा भी वही करेंगे।" "धीरज रखें महाराज! ऐसी कुशंका मन में क्यों ले आना?" चार ही दिन में राजा के विश्वस्त सहयोगी का पत्र आया। दुर्दैव से महाराज 538 :: सम्भाजी