छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतालाब सूख गये थे। स्वराज्य के अनेक भागों की दशा अत्यंत शोचनीय हो गयी थी। अकाल के कारण चिंचवड़ हवेली क्षेत्र के लोगों ने अपने गाँवों को छोड़ दिया था। वे पानी की खोज में अन्यत्र चले गये थे। घरों में ताले लगाकर दरवाजों पर बबूल और करौंदे के झाँखर रूँध दिये थे। बारह बलूतेदारों और अठारह प्रजावर्ग के निम्नलोगों की स्थिति तो कुत्तों से भी बदतर थी। कुछ लोग जंगलों में चूहे पकड़कर उन्हें भूनकर खाते थे। कहीं कोई चूहे की बिल में पड़े अनाज को निकालकर खाता था। अपने राज्य में महाराज जब घोड़े पर निकलते थे तो प्रजा की दुर्दशा देखकर उनका मन कराह उठता था। ग्रामपंचायत में सरकार की ओर से थोड़ा बहुत अनाज मिल जाता था। किन्तु राज्य का भंडार भी समाप्त हो रहा था। शम्भूमहाराज गाँव के देशमुख देशपाण्डे लोगों को एकत्र करके उनसे कहते थे, "जिनके पास जो भी अनाज है उसे बाहर निकालो। अपने कोठारों में चुराकर अनाज मत रखिए।" महाराज बहुत व्याकुल हो रहे थे। महाराज, हमारी गोठें खाली हो गयीं। हमारे पशु नहीं रहे " "बाबा, मुझे सब कुछ मालूम है। यह सच है कि हमें पशुओं को भी बचाना चाहिए। परन्तु उसके पहले मनुष्यों को बचाओ। किसी प्रकार अपनी रक्षा कीजिए। समय हमेशा ऐसा ही नहीं रहने वाला है।" शम्भूमहाराज घूम घूमकर लोगों का धीरज बँधा रहे थे। अनेक स्थानों पर ब्राह्मण अनुष्ठान कर रहे थे। बहुत से लोग महादेव के मन्दिर में मूर्ति को घेरकर बैठे थे। कुछ लोग सहायता के लिए हनुमानजी की प्रार्थना कर रहे थे। "कुछ भी कीजिए। जो मुट्ठीभर अनाज मिलता है उसके साथ घास पात खाइए। किन्तु मनुष्यों को किसी प्रकार बचाइए।" इस प्रकार की घोषणा महाराज कर रहे थे। एक ओर मराठी सेना बीजापुर और गोलकुंडा की सहायता के लिए जा रही थी। उसके लिए शम्भूमहाराज और कवि कलश को पन्हाला और मलकापुर में ठहरना पड़ता था। औरंगजेब गोलकुंडा और बीजापुर की ओर था। कुछ समय के लिए उसका संकट टल गया था। किन्तु भीषण अकाल से प्रजा की रक्षा करना अत्यन्त आवश्यक हो गया था। रसद और अनाज जुटाने के उपाय खोजे जा रहे थे। हिन्दवी स्वराज्य के सभी अच्छी पैदावार देने वाला केवल जिंजी का क्षेत्र था। वहाँ की समृद्धि निरन्तर बढ़ रही थी। अपना विश्वस्त मानकर ही महाराज ने हरजी को वहाँ नियुक्त किया था। इस समय स्वराज्य की सहायता जिंजी और कर्नाटक से ही हो सकती थी। अकाल ने मनुष्यों और पशुओं का भाग्य फोड़ दिया था। चारा पानी के अभाव में घोड़े अपनी जगह पर ही प्राणहीन होकर गर्दन लटका दिये थे। महाराष्ट्र सम्भाजी 537