छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 538, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंलिया। मैसूर, धर्मपुरी, श्रीरंगपट्टनम के क्षेत्र से शम्भूमहाराज के घोड़े दौड़ रहे थे। उन्होंने अपने हरजी जीजा पर भी दबाव बढ़ाया। उन्होंने हरजी को जिंजी से फौज के साथ श्रीरंगपट्टनम आने का आदेश भेजा। कोडक, म्लेय, तिगुड और मोरस के नायक शम्भूमहाराज की सहायता के लिए आ गये थे। श्रीरंगपट्टनम की चौकी जीतने के लिए जोरदार लड़ाई चल रही थी। वहाँ के किले के संरक्षण के लिए बड़ी बड़ी खाइयाँ खोदी गयी थीं। उस खाई पर छलाँग लगाने के लिए सैनिक और घोड़े दोनों हिचक रहे थे। लड़ाई हाथ से जाने की स्थिति आ गयी। उसी समय शम्भूमहाराज ने अपना घोड़ा खाई के उस पार कुदा दिया। खाई तो पार हो गयी किन्तु घोड़ा नोक के बल गिर गया। उसने उसी जगह पर रक्त के फौवारे छोड़ते हुए और पैर पटकते हुए प्राण त्याग दिये। शम्भूमहाराज के दाहिने कन्धे की हड्डी भी मुचक गयी। उसमें पीड़ा होने लगी। यह पीड़ा धीरे धीरे असह्य होने लगी। दक्षिण में पाँच-छः महीने बीत गये। निर्णायक जीत न तो चिक्कदेवराजा की हो रही थी और न ही शम्भूमहाराज की। गोलकुंडा जीतने के बाद बादशाह की सह्याद्रि क्षेत्र में प्रवेश करने की सम्भावना थी। इसलिए लड़ाई को बीच में ही छोड़कर शम्भूमहाराज ने महाराष्ट्र वापस चले आने का निर्णय लिया। वहाँ से आते समय महाराज ने अपनी दीदी अम्बिकाबाई और जीजा हरजी को समझाते हुए दुखी स्वर में कहा, "जीजाजी, हमें मिली विश्वस्त खबर के अनुसार प्रमुख सत्ता से अलग होकर अपने को स्वतन्त्र राजा बनाने का आपका विचार है। इस प्रकार आप मुख्य सत्ता का विरोध कर रहे हैं।" "ऐसा हो भी तो इससे क्या बिगड़ता है? एक और मराठा राज्य निर्मित होगा।" अपनी आँखों के भाव को छुपाते हुए हरजी ने कहा। "वैसे बिगड़ता तो कुछ नहीं। किन्तु जीजाजी, इस बात का ध्यान दीजिए कि यदि मन्दिर का हर एक खम्भा अपने सिर के भार को छोड़कर, स्वयं को कलश समझने लगे तो राजमन्दिर खड़ा किस प्रकार रह सकेगा।" बोलते बोलते शम्भूमहाराज बहुत गम्भीर हो गये। कर्नाटक से वापस आते समय शम्भूमहाराज, दस हजार बैलों की पीठ पर लादकर रसद और बहुत सा द्रव्य ले आये थे। कुछ समय के लिए रायगढ़ और काल नदी के क्षेत्र में लोगों को कुछ राहत मिली। किन्तु अकाल की भीषणता इतनी अधिक थी कि थोड़े ही दिनों में वह रसद भी समाप्त हो गयी। दो वर्ष बीत जाने पर भी स्वराज्य के ऊपर से अकाल की काली छाया उठ नहीं रही थी। जगह जगह पर जमीन में दरारें फट गयी थीं, वृक्ष पत्रहीन हो गये थे ५३० सम्भाजी