छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआदेशानुसार स्वयं कवि कलश सात हजार की फौज लेकर जत की ओर से युद्ध में सम्मिलित हुए थे। वे पिछले कई महीने से अचानक छापे मार-मारकर मुगल सेना को हैरान कर रहे थे। हंबीरराव मोहिते भी पन्द्रह हजार की घुड़सवार सेना लेकर रात-दिन छापे मार रहे थे और मुगलों की रसद को लूट रहे थे। सोलापुर से बादशाह हैदराबाद की गतिविधियों पर अपनी बारीक नजर रखे हुए था। इसे बादशाह का भाग्य ही कहेंगे कि कुतुबशाही फौज में आन्तरिक कलह आरम्भ हो गया। उनके दो सेनाधिकारियों—मुहम्मद इब्राहिम और शेख मिनाज के बीच झगड़ा हो गया। परिणाम यह हुआ कि कुतुबशाही फौज रात में ही डेरे-डंडे बटोर कर भाग गयी। बरामदखान ने बादशाह को खुशखबरी दी, "कुतुबशाही फौज भाग गयी। तानाशाह उसे संभालने की जगह स्वयं गोलकुंडा के किले में चला गया है। काफिर मादण्णा पंडित उसका मुख्य सलाहकार है।" "बरामदखान तुमने अच्छी याद दिलाई। तुम ऐसा करो, इस कुतुबशाह की बेगम और उसकी माँ को हमारा पैगाम भेजो। उनसे कहो कि तुम्हारे राज्य की यह दुर्दशा उस काफिर के कारण ही हुई है। कुछ भी करके उसका कत्ल करवा दो।" "जी हुजूर!" हैदराबाद लुटेरों के क़ब्जे में आ गया है, ऐसी खबरें आ रही थीं। सभी ओर लूटमार, भाग दौड़ का हंगामा मचा हुआ था। अच्छे घरों के खिड़कियाँ-दरवाजे तक चोर उठा ले जा रहे थे। मुगल फौज भी उसका लाभ उठा रही थी। बादशाह ने अपने विश्वस्त सरदारों को यह निगरानी रखने के लिए कि "मुअज्जम लूट का माल कहीं और नहीं रख रहा है?" एक दिन बादशाह के पास एक और खुशी की खबर आयी। बेगमों ने हमलावर भेजकर मादण्णा और आकण्णा की हत्या करवा दी। हैदराबाद के बीच रास्ते पर दिनदहाड़े दोनों की हत्या की गयी। इसप्रकार शम्भूमहाराज और कुतुबशाह के बीच का एक मजबूत सेतु टूट गया। मार्च 1686 में हैदराबाद के दूत बादशाह के पास आये। वे अपने साथ प्रधानमन्त्री मादण्णा का सूखा हुआ सिर भी लेकर आये थे। उस पर हाथ फेरते हुए बादशाह को बड़ा आनन्द आया। औरंगजेब और कुतुबशाह में तात्कालिक समझौता हो गया। उसके अनुसार कुतुबशाह को एक करोड़ बीस लाख का जुर्माना देना पड़ा। मालखेड़ और सेरम जैसे उपजाऊ प्रदेश भी बादशाह को मिले। कुतुबशाह ने सौ हाथियों का नजराना भी बादशाह को दिया। हैदराबाद के काफिरों को जड़ से समाप्त करने की सफलता से बादशाह बहुत प्रसन्न था। समझौते के कुछ समय बाद बादशाह ने अपनी शक्ति बीजापुर पर 542 :: सम्भाजी