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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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सोयराबाई अपने मूल मुद्दे पर आयीं—"स्वामी, शम्भूराजा तो धधकती आग है। स्वामी के बाद उन्हें सँभालेगा कौन?" शिवाजी महाराज हँसे उन्होंने सोयराबाई की आँखों में बदलती भावनाओं के रंग देखे। महाराज ने कहा, "अच्छा, तो आप यह सिफारिश करने आयी हैं कि कर्नाटक युद्ध में मुझे शम्भूराजा को साथ लेकर जाना चाहिए।" सोयराबाई कुछ हड़बड़ा गयीं। उन्हें लगा कि अपनी बात कहते कहते कुछ और ही तो नहीं बोल गयीं। अपने को सँभालते हुए उन्होंने फिर कहा, "नहीं, नहीं मेरे कहने का आशय यह नहीं था। आज कल युवराज और राज्य कर्मचारियों में ताल मेल नहीं बैठता। आपके इतनी दूर चले जाने पर इनमें यदि विरोध की आग भड़की तो उसे बुझाएगा कौन?" महाराज चुप हो गये। थोड़े समय के बाद सोयराबाई को तीखी नजर से देखते हुए बोले—"महारानी जी सच बताइये मुझे क्या करना चाहिए? हम अपने साथ उन्हें ले जाएँ या नहीं?" "आजकल उनका व्यवहार सारी सीमाओं को तोड़ चुका है। मानसिक क्लेश के अतिरिक्त स्वामी के हाथ और कुछ नहीं लगेगा।" महाराज थोड़ा रुके और फिर दर्द भरी आवाज में बोले, "आपकी ही तरह अष्ट प्रधान और विशेष रूप से अण्णाजी और राहुजी जैसे लोग भी शम्भूराजा के लिए आग्रह कर रहे हैं। वे हठ कर रहे हैं—कुछ भी कीजिए परन्तु अपनी अनुपस्थिति में उन्हें रायगढ़ पर मत छोड़िए। इसका अर्थ तो यह हुआ कि इस समृद्ध स्वराज्य में हमारे शम्भूराजा के लिए बहुत कठिन समय आया है।" सोयराबाई डर गयीं। सँवारने वाली भाषा में एक एक शब्द अलग उच्चारित करते हुए बोलीं, "बहुत पहले महाराज के मन में स्वराज्य को दो भागों में विभाजित करने का विचार आया था।" "आप यहीं पर रुक जाइए, महारानी।" शिवाजी महाराज की गरुड़ जैसी नाक पर पसीने की बूँदें छलक आयीं। उनका प्रशस्त मस्तक सिकुड़ गया। मस्तक पर रेखायें उभर आयीं। वे तीखी आवाज में बोले, "महारानी, हमारे हिन्दवी स्वराज्य के बँटवारे की कल्पना ही कितनी अशोभनीय और कष्टकारक है? यह राज्य या साम्राज्य हमारा है ही नहीं। पूर्वजों के पुण्य से, भगवान के आशीर्वाद से जन साधारण के खून-पसीने से हमें प्राप्त हुआ एक अमृत कलश है। उसे दो हिस्सों में कैसे बाँटा जा सकता है?" सोयराबाई से रहा नहीं गया। उन्होंने कहा, "परन्तु महाराज, आपके अकेले शम्भूराजा ही नहीं एक और पुत्र भी हैं।" "स्वीकार है। किन्तु यह महाराष्ट्र एक अच्छे आचार और विवेक से प्रतिबद्ध सम्भाजी :: 53