छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहै। शम्भू हों या राजाराम जो अपने कर्तृत्व से महान बनेगा, प्रजावर्ग और सैनिकों का लाड़ला होगा, वही अपने परिश्रम से उत्तराधिकारी बनेगा।" सोयराबाई का मन टूट गया। एक सामान्य स्त्री की तरह वे दहाड़ें मारकर रोने लगीं। उनकी जैसी धीर-गम्भीर स्त्री का यह स्वरूप शिवाजी महाराज पहली बार देख रहे थे। महारानी किसी भी प्रकार हटने को तैयार न थीं। अन्त में उन्होंने कठोर शब्दों में महाराज से कहा, "महाराज या तो राजाराम के लिए राज्य बाँटकर दे दीजिए या फिर अकेले शम्भूराजा को साथ लेकर न जाइए। इनमें से यदि एक बात न मानी गयी तो मैं भोजन पानी छोड़कर भगवान को प्यारी हो जाऊँगी।" शिवाजी महाराज ने किसी प्रकार समझा-बुझाकर सोयराबाई को अन्तःपुर में भेज दिया। किन्तु महाराज स्वयं अन्दर-बाहर से भयभीत हो गये थे। उन्हें हल्का सा बुखार आ गया। वे बेचैन हो गये। अन्ततः उन्होंने अपने समीपी बालाजी चिटणीस को बुलवाया। महाराज दुखभरी वाणी में बोले- "चिटणीस, वीर पुरुष के कर्तृत्व की कोई सीमा नहीं होती। हो सकता है कि खुले मैदान बारूद के गोले से कोई बच जाय, किन्तु माया-ममता और स्वार्थ के जंजाल से कोई कभी बच पाया है क्या ? चाहे राम हों या कृष्ण। इन धागों के जंजाल से महान लोग भी हैरान हो जाते हैं।" बालाजी पन्त चिटणीस बहुत समय तक महाराज के साथ विचार विमर्श करते रहे। उनसे अधिक महाराज का मन जानने वाला दूसरा कौन था? बालाजी पन्त ने अपनी राय दी- "महाराज रानी साहेब की शपथ में इतना क्या उलझना। आपने मन में शम्भूराजा को युद्ध में साथ ले जाने का निश्चय किया है न ? तो प्रसन्नतापूर्वक लेकर जाइए।" शिवाजी महाराज खिन्नता से हँस दिये और बोले, "कोई व्यक्ति यदि पति पत्नी के रिश्ते को सारी जिन्दगी बिताए तो भी यह कहना ठीक नहीं कि वह उसे पूरी तरह जानता है। आज महारानी से मुझे जो अनुभव मिला वह बहुत ही विलक्षण और विस्मयकारक है।" "महाराज।" "हाँ बालाजी। हमें कठिनाई में डालने के लिए महारानी और अन्य लोगों ने जो समय चुना है वह भी बहुत कठिन है। कर्नाटक की लड़ाई दो-चार दिन में ही आरम्भ होने वाली है। आधी से अधिक सेना गयगढ़ मे निकल चुकी है। ऐसे समय में घरेलू झगड़ों के कारण यदि मैंने युद्ध को स्थगित किया तो हमारी प्रतिष्ठा नहीं बचेगी। आज हम शम्भूराजा को ही नहीं अपनी न्यायबुद्धि को भी यथोचित न्याय नहीं दे पा रहे हैं। अभी भी भविष्य के गर्भ में क्या-क्या रचा जा रहा है इसे माता भवानी ही जाने।" 51 सम्भाजी