छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचार येसूबाई बड़ी हड़बड़ी में अपने महल में लौट आयीं। रायप्पा ने उन्हें सूचित किया था कि शम्भूराजा आज रोज से बहुत पहले अन्तःपुर में लौट आये हैं। थके हुए युवराज सीधे अपने शयन कक्ष में चले गये थे। चिराग के लालप्रकाश में येसूबाई ने युवराज की क्लान्त मुदा को देखा। वे बहुत चिन्तित दिख रहे थे। युवराज के कन्धे पर हल्के से अपना हाथ रखकर येसूबाई ने कहा, "लगता है बहुत थक गये हैं। कर्नाटक युद्ध कहें तो कितनी बड़ी तैयारी। सीध नीचे की ओर रामेश्वर, जिंजी तक की दौड़।" "क्या आपको सचमुच ऐसा लगता है कि मुझे वहाँ जाना चाहिए?" युवराज ने कुछ आवेश के साथ पूछा। "क्यों नहीं? आप तो जब केवल आठ नौ वर्ष के थे तभी आगरा तक की दौड़ लगा आये थे।" शम्भूराजा के माथे पर हाथ फेरते हुए येमूबाई ने कहा, "अब तो आप हिन्दवी स्वराज्य के भावी उनराधिकारी हैं। मसुर जी ने युवराज के रूप में आपको पहले ही सम्मानित कर दिया है। दूमरी एक बात मम्भवतः आपके ध्यान में नहीं आ रही है।" "कौन सी?" "रायगढ़ के देवदुर्लभ राज्याभिषेक समारोह के बाद महाराज की यह पहली युद्ध यात्रा है। उसमें अपनी तलवार का जौहर दिखाने का सुअवसर आप क्यों छोड़ रहे हैं?" येसूबाई के उत्साहवर्धक शब्दों से युवराज और भी उनेजित हो गये। वे बिस्तर से उठकर कक्ष में इधर उधर घूमते हुए बोले- "येसू जरा रुक! यों ही खयाली पुलाव मत पका।" "मतलब?" "पिताजी ने मुझे युद्ध में न ले जाने का निर्णय ले लिया है।" "क्या कह रहे हैं?" येसूबाई का चेहरा एकदम उतर गया। शम्भूराजा कुछ अधिक नहीं बोले। बहुत समय तक घायल सिंह की भाँति घूमते रहे। येसूबाई को कुछ सूझ ही नहीं रहा था। लगभग चार-पाँच घंटे तक, जब तक उनके पैर थक नहीं गये, शम्भूराजा उसी अस्वस्थता में घूमते रहे। उनकी आँखें पूरी तरह खुली थीं। सम्भाजी : 55