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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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शहंशाह ने मुकर्रबखान जैसे हैदराबादी सरदार को फोड़ लिया। अबदुल्ला फन्नी नाम के एक अधिकारी ने सवेरे तीन बजे किले का द्वार खोल दिया। कपटनीति और दगाबाजी की जीत हुई। 29 सितम्बर 1687 को गोलकुंडा पराजित हुआ। वहाँ बादशाह को सात करोड़ रुपये का खजाना मिला। सालाना तीन करोड़ आय का प्रदेश मिला। केवल पचास हजार रुपये की तनख्वाह पर सिकन्दर आदिलशाह और कुतुबशाह को देवगिरि के किले के बन्दीखाने में भेज दिया गया। जिस समय हैदराबाद जीतकर बादशाह बीजापुर की ओर लौट रहा था, उस समय विजय की प्रसन्नता के साथ उसका एक विशिष्ट विषाद से भरा हुआ था। कुछ महीने पहले हैदराबाद के घेरे के समय एक घटना घट चुकी थी। इसके पहले शहजादा मुअज्जम के पास शम्भू महाराज के पत्र पकड़े गये थे। किन्तु उस रात को शहजादा आजम के द्वेष के अथवा किसी अन्य कारण से या महत्त्वाकांक्षा की ललक में मुअज्जम ने एक दुस्साहसी कदम उठाया। अपने बाप से बगावत करके उसी रात वह कुतुबशाह से मिलकर लड़ाई की घोषणा करने वाला था। उसे केवल इस बात का डर था कि उसके जाने के बाद उसका बाप उसके बीवी, बच्चों की दुर्गति करके हत्या कर देगा। इसलिए उसने रात में ही अपने बीवी बच्चों को लालबारी से लड़ाई के मैदान में आगे ले गया। वहाँ से छलाँग लगाना सरल था। मुअज्जम के इन कारनामों से बादशाह को बगावत का शक हुआ। उसने तुरन्त सेना भेजकर शहजादे मुअज्जम और उसके बीवी, बच्चों को हमेशा के लिए गिरफ्तार कर लिया। वृद्ध बादशाह का काफिला आगे निकल रहा था। उसकी दृष्टि पश्चिम की ओर न जाकर बार-बार सह्याद्रि की ओर घूम रही थी। पिछले सात वर्षों से उसे सम्भाजी मिल नहीं पा रहे थे। अविजित रामशेज और हैवतीगढ़ आज भी अबाधित थे। जो कुछ पाया उसकी अपेक्षा जो खोया उसका बादशाह को बड़ा दुख था। बादशाह का स्वाभिमानी मन बहुत सन्तप्त हो रहा था। प्रवास के समय ही असदखान बादशाह के समीप आकर कहने लगा, "बादशाह सलामत, कुछ राहत देने वाली खबर है।" "कौन-सी?" "अपना प्रिय शहजादा अकबर ईरान चला गया। सम्भा ने उसकी मदद की। राजापुर के बन्दरगाह में उन्होंने एक निजी जहाज तैयार किया। अन्ततः वह चला गया।" "कहाँ, ईरान को?" "जी मेरे मालिक।" सम्भाजी :: 553