छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबादशाह एक विषंड हँसी हँसा। कभी आसमान की ओर तो कभी धरती की ओर देखते हुए उसने कहा, "किसकी किस्मत और किसकी बदकिस्मत किस जंगल या किस पहाड़ में लिखी है? इसे तो खुदा ही जाने।" तीन एक दिन हंबीरराव ने महाराज से महज ही कहा, "शम्भू महाराज, स्वराज्य की स्थिति बिगड़ती जा रही है। जागीरों की लालच में अच्छे-अच्छे लोगों का दिमाग बदलता जा रहा है। इसको रोका भी जाये तो कैसे?" "मामा साहब, समय ही बहुत कठिन आ गया है।" "परन्तु महाराज, जैसा आपने कहा, इस कठिन समय को निभाना पड़ेगा। इसके लिए जैसे वह औरंगजेब जागीरें बाँट रहा है, वैसे हम भी नकली कागजातों पर कुछ लोगों को जागीरें दे दें।" "ऐसा कैसे हो सकता है, हंबीरमामा ?" हंबीरराव के सुझाव पर शम्भू महाराज अत्यन्त गम्भीर होकर बोले, "जागीरों को बाँटना पिताजी के द्वारा दिए गये आदेशों के विरुद्ध है। पिताजी कहते थे देवताओं को भी जागीर मत दो। उन्हें भ्रष्ट न करो।" शम्भू महाराज ने विनोद में आगे कहा, "मामा साहब आपको जागीर की आशा कब से लगी ?" विनोद के भाव को न समझने के कारण यह सीधा सा विनोदी प्रश्न हंबीरराव के कलेजे में तीर की तरह चुभ गया। कुछ क्षणों के लिए उन्हें कुछ समझ में नहीं आया। फिर भी उन्होंने हँसते हुए कहा, "शम्भू महाराज, आपने अपने मामा को क्या समझा है ?" वह विनोद का प्रसंग वहीं पर समाप्त हो गया। किन्तु हंबीरराव के भीतर शम्भू महाराज का प्रश्न चुभता रहा। उनका चेहरा अपमान के बोध से फीका पड़ गया। मानहानि के बोध से उनका कलेजा टूटने लगा। उन्होंने कहा, "शम्भू महाराज इस हंबीरराव को जागीर की जरूरत ही क्या है ? यदि मुझे सत्ता या राजपद की भूख होती तो अपने सगे भांजे राजाराम को रायगढ़ के सिंहासन पर बिठाकर आधे राज्य का मालिक बन गया होता। राजाराम को राजा बनाने के लिए हमारे बुजुर्ग 554 सम्भाजी