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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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अधिकारी बेताब हो रहे थे। मुझे तो उसमें कोई कठिनाई नहीं थी। ' ' ' 'हंबीरमामा! कृपया इस बात को इतनी गम्भीरता से न लें मैंने तो विनोद में कहा था।' ' शम्भू महाराज ने उन्हें मनाने के स्वर में कहा। शम्भू महाराज मनाने की पूरी कोशिश कर रहे थे किन्तु सेनापति हंबीरमामा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था। उन्होंने कहा, ' 'हमारी वफादारी की परीक्षा लेने औरंगजेब के दूत भी आये थे। हमने उनकी दाढ़ी मूँछें मुड़वाकर उन्हें भगा दिया। फिर भी आपने आज हमारी ऐसी परीक्षा ली।' ' हंबीरराव का स्वाभिमानी मन विनोद में किये गये आरोप को सह नहीं पा रहा था। वे आवेश में ही वहाँ से उठकर चले गये। इस प्रसंग से येसूबाई भी आश्चर्यचकित रह गयीं। शम्भू महाराज के लिए अब वहाँ रुक पाना सम्भव नहीं हो रहा था। वह भी उठकर अपने कक्ष में चले गये। इस छोटे से वाद विवाद से रायगढ़ का रंग ही बदल गया। अपने कक्ष में उदास बैठे शम्भू महाराज के पास येसूबाई गयीं। उन्होंने शान्त स्वर में बड़ी सावधानी से कहा, ' 'जो भी हुआ अच्छा नहीं है। राजा और सेनापति के बीच अनबन से सल्तनत का विनाश हो जाता है। इस घटना की भनक औरंगजेब को लगने की देर है। आप दोनों में दरार पैदा करने के लिए वह जी जान से कोशिश करेगा।' ' ' 'आखिर मैंने ऐसा क्या कह दिया था, युवराज्ञी?' ' ' 'महाराज, हंबीरमामा ने जो कुछ कहा वह भी गलत नहीं था।' ' येसूबाई ने बड़े विवेक से कहा, ' 'चलिए उठिए उन्हें सम्मान के साथ पुनः बुलाकर ले आयें। आप उम्र में छोटे हैं। उनकी मान मर्यादा की रक्षा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।' ' ' 'हम तो बच्चे हैं। हम क्यों जाएँ उनके पास? वे बड़े हैं इसलिए उन्हें ही हमें मनाने आना चाहिए।' ' इस घटना से उत्पन्न सन्ताप के कारण महाराज ने रात को भोजन में कुछ भी ग्रहण नहीं किया। बिस्तर में आधी रात तक तड़पते रहे। दूसरे दिन देव पूजन भी नहीं कर सके। विगत अनेक वर्षों में ऐसा कभी नहीं हुआ था। दोपहर को महारानी के आग्रह के कारण किसी प्रकार आधा प्याला दूध लिया। दूसरी रात महारानी येसूबाई बेचैन हो गयीं। किले पर शीतल हवा चल रही थी। इस छोटी सी घटना को लोगों ने बहुत बड़े झगड़े के रूप में प्रचारित कर दिया था। यह सब कुछ न सह पाने के कारण महारानी जाकर महाराज के सामने खड़ी हो गयीं। वे अपने भीतर का रोष छुपा न सकीं। उन्होंने कहा, ' 'बस, अब बहुत हो चुका। महाराज! आपको पता है? पिछले दो दिनों में मामा ने अन्न का एक दाना सम्भाजी :: 555