छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्रहण नहीं किया है।" शम्भू महाराज झट से उठकर खड़े हो गये। उनका गला भर आया। उन्होंने कहा, "क्या कह रही हो येसू? आपने दोपहर को ही मुझे यह क्यों नहीं बताया? हमारे हंबीरमामा को आप क्या समझती हैं। पिछले पाँच छह वर्षों में पिताजी के पुण्य की छाया और हंबीरमामा का साथ के अतिरिक्त क्या किसी और ने हमारा साथ दिया है?" शम्भू महाराज ने अपने वस्त्र ठीक किये, सेवकों ने जो रत्नाभूषण सामने किये उन्हें पहन लिये। शम्भू महाराज और महारानी दोनों हंबीरमामा के घर जाने के लिए दरवाजे से बाहर निकले। महाराज ने मशाल की रोशनी में देखा तो बाहर मन्द पवन का सेवन करते हंबीरमामा स्वयं खड़े थे। वे स्वयं महाराज से मिलने आये थे। महाराज कुछ पूछें उससे पहले सत्तर वर्ष की आयु पूरा कर चुके, मजबूत कदकाठी वाले हंबीरमामा ने बड़ी व्यग्रता के साथ कहा, "शम्भू बेटे, आपने यह क्या चला रखा है? पिछले दो दिनों से आपने कुछ भोजन ही नहीं लिया।" "मेरी बात जाने दीजिए। परन्तु मामा आपने उपवास क्यों रखा है?" "हम तो पीले पत्ते हैं। हमारी इतनी चिन्ता क्यों करते हैं? आपको तो हिन्दवी स्वराज्य का भविष्य गढ़ना है। हम तो आज हैं, कल हों न हों।" आगे बढ़ते हुए महाराज बोले, "हंबीरमामा, ऐसी अशुभ बात मुँह से न निकालें। आपके न होने की कल्पना मात्र से हमें ऐसा लगता है जैसे हमारे ऊपर पहाड़ टूट पड़ा हो।" बाहर शीतल हवा चल रही थी। राजमहल के बन्द वातावरण में जाने का किसी का मन नहीं हो रहा था। मामा-भांजे साथ-साथ पश्चिम की ओर चलते रहे। कुछ दूरी पर कातीव छोर था और दूसरी ओर हिरकणी बुर्ज। वहीं पर एक समतल पत्थर पर दोनों बैठ गये। पास ही एक पत्थर पर बैठकर येसूबाई दोनों के मनोमिलाप को बड़े कुतूहल से देख रही थीं। आधी रात के समय स्वयं महाराज के बुर्ज पर आने से पहरेदारों में हलचल मच गयी थी। वहीं पर राजमहल से भोजन मँगवाया गया। महाराज और सेनापति ने वहीं पर भोजन किया। चर्चा के दौरान कई बातें निकलीं। हंबीरमामा ने कहा, "हमारे सगे भांजे और जवाई राजाराम को राजा बनाने के लिए राज कर्मचारी हठ कर रहे थे, इसका पता है शम्भू महाराज?" महाराज ने सिर्फ मामा की ओर देखा। "महाराज, उन संकट के दिनों में मैंने आपको शिवाजी के पुत्र के नाते नमन नहीं किया था बल्कि यह मानकर कि आप हमारे शिवाजी के स्वप्नों के सच्चे उत्तराधिकारी हैं इसलिए आपके सामने हमारी गर्दन झुकी थी।" "आपके उन उपकारों को यह हिन्दवी स्वराज्य कभी भी भूल नहीं पाएगा, 556 :: सम्भाजी