छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 559, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंहंबीरमामा। किन्तु मुझसे यदि कोई भूल हुई है तो क्षमा करें मामाजी।'' "क्षमा की क्या बात कर रहे हैं शम्भू महाराज? हंबीरराव नाम की इस तलवार को शिवाजी महाराज ने फौलाद की दहकती भट्टी में निर्मित किया है, उसे सजाया सँवारा है। किन्तु चारों ओर उसने रणकौशल दिखाया तो आपके समय में।'' "सच है मामासाहब, कहाँ ब्रह्माणपुर, कहाँ मुर्तजापुर, अकोला, नान्देड़, सोलापुर से अथणी-बीजापुर, कोंकण का घाट हर एक रास्ता। दक्खिन की भूमि पर ऐसी कोई नदी या नाला नहीं होगा जहाँ हंबीरराव मोहिते के घोड़े ने पानी न पिया हो। पर हंबीरमामा आजकल आपको कुछ थकान महसूस होती है क्या?'' "मतलब?'' "मतलब, यदि स्वास्थ्य न ठीक हो तो आप कुछ आराम करें और हमारा मार्गदर्शन करते हुए अपना आशीर्वाद दें।'' रायगढ़ के पश्चिमी छोर की छाती पर पाँव रखते हुए हवा का एक तेज झोंका आया। हंबीरमामा ठठाकर हँसते हुए बोले, "अम्बा भवानी का सेवक जैसे हाथ में मशाल लेकर रात रातभर नाचते हुए जागरण करता है, उसी प्रकार शिवाजी का सेवक यह हंबीरराव युद्धभूमि में तोपों की ताल पर घोड़े नचाने का कार्य करता है।'' "मामासाहब इस सम्भाजी को भी औरंगजेब की तोपों या ढाल, तलवारों से जरा भी भय नहीं लगता। हमें केवल एक बात का भय लगता है—'' "—महाराज?'' "हाँ हंबीरमामा, कभी कभी लगता है कि यह देश सन्तों, महन्तों और बुद्धिमानों का न होकर, बाल बच्चों के नाम जागीरों के कागज-पत्र बनवाने के लिए आतुर जागीरदारों का हो गया है।'' "सच है महाराज, दुनिया में मनुष्य की कोख से बच्चे ही पैदा होते हैं। किन्तु अपने महाराष्ट्र की तरह अपने बाले बच्चों और उत्तराधिकारियों से ऐसा अन्धा प्रेम करने वाले लोग दुनिया में कहीं खोजने पर भी नहीं मिलेंगे।'' शम्भू महाराज ने भारी मन से पूछा "तो मामासाहब क्या किया जाय? निर्णय ले लिया जाय?'' "कौन सा?'' "स्वराज्य के टुकड़े टुकड़े करके सभी जागीरदारों में खैरात बाँट देने का?'' "नहीं, बिलकुल नहीं।'' हंबीरराव ने दृढ़ता से कहा, "शम्भू बेटे! उस औरंगजेब को हमारे कुछ मूर्खों को खुशी खुशी खैरात बाँटने दो किन्तु इस हंबीर और शम्भुराजा की ओर से शिवाजी महाराज के विचारों की हत्या नहीं की जाएगी।'' इस मूक संवाद में सारी रात कैसे बीत गयी पता ही नहीं चला। सम्भाजी 557