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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

पृष्ठ 560, कुल 793 में से

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चार दुर्गादास राजपूताना के लिए प्रस्थान कर रहे थे। वे महाराज से मिलने के लिए आये। भाव भरे हृदय से दुर्गादास ने शम्भू महाराज से कहा, "शम्भू महाराज, आपने हमारे लिए बहुत किया। आपने जितना किया उसके लिए हम कितना भी धन्यवाद दें, कम ही होगा।" "दुर्गादास, हम भी और अधिक क्या कर सकते हैं? शहजादे का स्वभाव ऐशोआराम का था। किसी भी प्रकार की जागरूकता नहीं थी। थोड़ी भी हिम्मत की होती तो किसी न किसी रास्ते से हम शहजादा अकबर को दिल्ली-आगरा की ओर भेज दिए होते। उसके उधर जाने से बादशाह के दुश्मन अपने आप अकबर के झंडे के नीचे आ जाते। परन्तु क्या किया जाय? वह तो स्वभाव से ही डरपोक। दस-दस बीस-बीस हजार लोगों के सहायक होने पर क्या लाभ हो पाया?" "जाने दें महाराज! आप भी क्या कर सकते हैं? घोड़े की नयी नाल बँधवाने का कार्य लोहार के पास दिया जा सकता है, किन्तु आदमी की रीढ़ की हड्डी बनाने का काम किसी के लिए भी सम्भव नहीं है। हमारा सात वर्षों का कष्ट, सारा संघर्ष व्यर्थ हो गया।" दुर्गादास ने दुखी स्वर में कहा। "दुर्गादास, एक बात कहूँ?" "आज्ञा हो महाराज।" "अम्बर के राजा रामसिंह ने औरंगजेब के राजाओं के संगठन बनाने के हमारे आवाहन को प्रतिसाद नहीं दिया। फिर भी मैंने हार नहीं मानी। किन्तु मुझे लगता है कि आपके जैसा देशाभिमानी, धर्माभिमानी व्यक्ति हमारे पास रहे। आप किसलिए राजपूताना जा रहे हैं? आप यहीं रहिये। जिस प्रकार कविराज भूषण के रहने से रायगढ़ की शोभा में वृद्धि हुई थी, उसी प्रकार आप जैसे भले व्यक्ति के साथ होने से हमारा विश्वास दृढ़ होगा।" "क्षमा करें महाराज! महाराज जसवन्तसिंह को मरने से पहले मैंने एक वचन दिया था। मैंने कहा था कि अजितसिंह को पाल पोसकर मैं बड़ा करूँगा। उसके अनुसार जोधपुर जाकर वहाँ की राजगद्दी की सेवा करना मेरा कर्तव्य है, महाराज।" 558 :: सम्भाजी

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