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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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"किन्तु पिछले छह-सात वर्षों के अनुभव से मेरे सिर के बाल-" बादशाह बोलते-बोलते रुक गया। उसने अपने सिर पर हाथ फेरा। सिर पर मुकुट नहीं था। उसके सुनहरे बाल भी विरल हो गये थे। थका हुआ बादशाह बोला, "खैर, सम्भा का जिन्दा मिलना तो बहुत मुश्किल है। किन्तु यदि वह न मिला तो उसका एकाध हाथ या पैर तोड़कर-" "मतलब ?" "उसका एक बड़े से बड़ा किला-जैसे रायगढ़, राजगढ़, पन्हाला या हंबीरगढ़ऽ !" "जरूर, जहाँपनाह जरूर।" कोयना नदी पार कर हंबीरराव की सेना तलबीड पहुँच गयी। अब तक आधी रात बीत चुकी थी। घर में सभी लोग जग रहे थे। लड़ाई पर जाते समय करहाड क्षेत्र से गुजरते हुए हंबीरराव तेज हवा के झोंके की तरह अपने तलबीड के घर पर जाते थे। कुछ घंटे रुककर वे हवा के झोंके की तरह ही निकल जाते थे। यदि घर के लोग रात रुकने का आग्रह करने लगते तो वे कहते, "औरंगजेब को दफन किये बिना हमें पीठ टिकाने की आज्ञा भगवान कहाँ देने वाले हैं?" परन्तु आज वे तन-मन से बहुत देर तक घर पर रुके रहे। उनकी प्यारी बेटी ताराऊ रायगढ़ से मायके आयी थी। अपने मायके में आनन्दित थी। हंबीरराव ने उसके पति राजारामसाहब और महारानी येसूबाई की कुशलक्षेम पूछी। उन्होंने बड़े वात्सल्यभाव से ताराबाई से कहा, "तारूऽ, येसूबाई का बराबर ध्यान रखना। स्वराज्य पर संकट बढ़ने के कारण महाराज चिन्ताग्रस्त हैं। महाराज तनाव में हैं इसलिए येसूबाई भी तनावग्रस्त हैं।" "बाबा, आजकल बड़ी बाईसाहब मुझे अपनी छाया की तरह लिये रहती हैं।" "देख बेटी बराबर ध्यान रखती रहना। यह कभी न भूलना कि तुम शिवाजी महाराज की पुत्रवधू हो।" "उसके साथ ही मैं हंबीरराव की बेटी हूँ। इस बात को मैं कभी भूल नहीं सकती, बाबा।" तारा के यह कहने पर सारा घर ठठाकर हँस पड़ा। आधी रात हो चुकी थी। हंबीरराव और उनके पच्चीस-तीस विशिष्ट साथी भोजन के लिए तैयार हुए। आँगन के मध्य में पत्तलें बिछा दी गयीं। खुली हवा में हंबीरराव सुखपूर्वक भोजन कर रहे थे। इसी समय घर के दरवाजे पर घोड़ों की टाप सुनाई दी। हंबीरराव के कान हिरनों की तरह सावधान हो गये। वे चिन्तित होकर इधर-उधर देखने लगे। हंबीरराव चार ग्रास खा लें इसलिए घर के लोगों ने हरकारे 560 : सम्भाजी