छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंको कुछ समय के लिए रोक लिया। किन्तु समय पूछकर नहीं आता। हंबीरराव ने ऊँची आवाज में पुकारा, "बाहर कौन है? अन्दर आ जाओ।" हरकारा सामने आकर खड़ा हो गया। हंबीरराव ने पूछा, "क्यों रे जानू? क्या खबर है?" "सरकार, अपने देश पर औरंगजेब ने आक्रमण करने के लिए सर्जाखान को भेजा है। "क्याऽऽ?" हंबीरराव ने भोजन छोड़कर हाथ धो लिया। उन्होंने दुपट्टे से हाथ पोंछते हुए खड़े-खड़े ही पूछा, "कहाँ? किस तरफ हैं वे शत्रु?" "वे अभी तलबीड पर नहीं आये हैं। किन्तु दोपहर में उनकी सेना औंधघाट के रहिमतपुर में उतरी थी। सन्ध्या समय वे कृष्णा नदी पार कर रहे थे।" "कितनी सेना है?" "दस-बारह हजार।" "—और दिशा उन्होंने कौन सी पकड़ी है?" "प्रतापगढ़ की ओर जा रहे हैं। खान ने कुछ भी करके दो दिन में प्रतापगढ़ जीतने का बीड़ा उठाया है।" अपने सामने की थाली बगल में सरकाकर सभी उठ गये। सभी शीघ्रता से घर के बाहर निकले। अपने पति को चार ग्रास खाने को भी नहीं मिलता यह सोचकर हंबीरराव की पत्नी को बड़ा दुख हुआ। उन्होंने अपने अश्रुओं को छिपाने का प्रयास किया। किन्तु उनकी ओर देखने का सेनापति के पास समय ही नहीं था। किन्तु घर की देहरी पर शुभेच्छा में हाथ हिलाती प्यारी बेटी खड़ी थी। हंबीरराव ने एक क्षण के लिए घोड़े को रोका, "बोल बेटी, मायके की ओर से तुम्हारे लिए क्या करूँ?" "बाबा कुछ नहीं। दुश्मनों के हाथ में अपने प्रतापगढ़ को न जाने दें। वहीं पर अपनी भवानी का मन्दिर है।" 'हर हर महादेव' की गर्जना के घोड़ों ने अँधेरे की राह पकड़ी। रास्ते में दूसरे हरकारे मिले। उन्होंने बताया कि सर्जाखान की पन्द्रह-सत्रह हजार की फौज सातारा से वाई की ओर बढ़ रही है। हंबीरराव ने अपने सहयोगी नारोजी भोंसले से कहा, "अपनी मुख्य फौज तो अंबा-घाट के नीचे कोंकण में गयी है। यहाँ तो हम यों ही चले आये थे। अब क्या किया जाय? इस तरह के अचानक संकट की तो हमने स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी।" "सेनापति, कुछ भी करके शत्रु को रोकना चाहिए। यदि उसने प्रतापगढ़ जीत लिया तो हमारी इज्जत का कचरा हो जाएगा।" सम्भाजी :: 561