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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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समाधि के दर्शन किये। वहाँ से उनके पैर जीजामाता की समाधि की ओर मुड़ गये। जीजामाता की समाधि से हटने का उनका मन ही नहीं हो रहा था। उन्हें लगा जैसे दादीजी उनसे बात कर रही हों। अपने भातुल परदादा लखोजी जाधवराव ने दौलताबाद के अजेय किले पर कैसे झंडा फहराया था? वह दादीजी की बताई हुई कहानी उन्हें याद आने लगी। आगे का सफर तय करना था। इसलिए सहयोगीगण व्यग्र होने लगे। महाराज उठे और समाधि पर अपना सिर रखकर बहुत समय तक वैसे ही बैठे रहे। ऐसा लगा जैसे कोई नन्हा-सा पोता अपनी दादी की गोद में सिर रखकर प्यारी- प्यारी बातें कर रहा हो। वहाँ से चलने से पूर्व महाराज ने अपनी दादी से केवल इतना कहा, “दादीजी, उस औरंगजेब का सिर ऊपर रायगढ़ पर ले जाने मे पहले आपके चरणों में लाकर रखूँगा।” सन्ध्या समय महाराज और महारानी ने बल्लालेश्वर का अभिषेक किया। मन्दिरों को महाराज ने भरपूर दान दिया। सरसगढ़ की तलहटी में डेरे डंडे खड़े किये गये थे। महाराज ने किसी प्रकार एक दो घंटों की नींद ली। आधी रात को उन्होंने खंडो बल्लाल को बुलाया। महाराज ने कहा, "हमें आसरा में वीरेश्वर के दर्शन करने हैं।" सवेरे-सवेरे आसरा के मन्दिर परिसर में घोड़े पहुँच गये। महाराज को वीरेश्वर के परिसर में बड़ी प्रसन्नता हुई। यहाँ से थोड़ी ही दूरी पर औढ़ा का मैदान था। बालाजी पन्त की अकारण हत्या का स्मरण महाराज को निरन्तर दुखी करता था। उसी से मुक्त होने के लिए महाराज ने वहाँ पर महादेव का मन्दिर बनाने के लिए अर्जोजी यादव को आदेश दिया था। महाराज ने मन्दिर और पीछे बनाये गये तालाब का निरीक्षण किया। भोर में ही वे मन्दिर के भीतर गये। उन्होंने सपत्नीक देवता के दर्शन किये। शिव की पिंडी के ऊपर स्वर्णपात्र से अमृतधार प्रवहमान थी। महाराज ने पुजारियों को आदेश दिया, “वहाँ पिंडी पर अखंड जलधार चालू रखिये।” मन्दिर के गर्भगृह से बाहर निकलते समय महाराज ने पुनः पिंडी की ओर देखा। वे अत्यन्त भाव विह्वल होकर बोले, “बालाजी काका इस पात्र से वीरेश्वर की पिंडी पर सतत गिरने वाली जलधारा, आपकी स्मृति में इस शम्भु द्वारा आँसुओं से किया जाने वाला आपका अभिषेक है।” महाराज जब मन्दिर से बाहर निकल रहे थे तो उन्हें मूर्च्छा-सी आ गयी। उस समय उनका एक हाथ खंडो बल्लाल ने थाम रखा था और दूसरे हाथ से वे आँसू पोंछ रहे थे। घोड़े महाड़ की दिशा में वेग से दौड़ने लगे। चाम्भार खाटी के पास से महाराज ने रानी को विदा कर दिया। शिर्के को सबक सिखाने के लिए उनके घोड़े और लोग शिरकाण की ओर टूट पड़े। 578 :: सम्भाजी