छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 579, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिन्तु महाराज मेरे प्रति आपका व्यवहार कितना आत्मीय और मर्यादापूर्ण रहा।" "गोदू, मैं भी जब तुम्हारे समीप आया था तब तुम्हारे इस सुन्दर और निर्मल˙ रूप को देखकर मेरे भीतर का विकार कब का नष्ट हो गया था। गोदू, हमारे बीच ऐसा कौन-सा रिश्ता है जिसे मैं कोशिश करने पर भी व्यक्त नहीं कर पाता। किन्तु- किन्तु क्या दिया मैंने तुम्हें? जीवन भर जलते रहने की सजा।" "सभी अपने स्वार्थ के लिए भगवान की पूजा नहीं करते। अनजाने में ही मैं आपकी ओर आकर्षित हो गयी थी। संयोग से मुझे महारानी का साहचर्य मिला। उनमें जब मैंने अपनी बड़ी बहन का रूप देखा तो आपके प्रति आकर्षण के पंख अपने आप टूट गये।" "तुम पागल हो! किसी और के साथ विवाह के लिए तैयार भी नहीं हुई।" "उसके लायक दूसरा कोई व्यक्ति मिला ही नहीं और मिलने वाला भी नहीं था। क्योंकि मेरे दिल का मन्दिर मेरे भगवान, केवल आपके लिए बना था।" "अब तुम्हें क्या चाहिए, गोदू?" गोदू ने आगे बढ़कर महाराज के पाँव पकड़ लिये। बड़ी अधीरता से वह बोली, "आपसे एक ही प्रार्थना है, जब मेरी मृत्यु हो तो मेरी चिता को आप ही आग दें।" "चिता को अग्नि? सिर्फ अपनों की चिता को अग्नि दी जाती है, गोदू।" महाराज सहज भाव से बोले। "तो आप मेरे कौन हैं?" यह प्रश्न करते हुए गोदू की आँखों से अश्रुपात हो रहा था। शम्भू महाराज ने उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया। हाथ का यह स्पर्श अत्यन्त सान्त्वनादायक था। उसी रात जिंजी से केसो त्रिमल का सन्देश प्राप्त हुआ। उन्होंने लिखा था— "हरजीराजा काबू में आ गये हैं। उनकी महत्त्वाकांक्षा के अश्व को लगाम लगाने में हम सफल हो गये हैं। इसके बाद यहाँ से नियमित रूप से रसद कैसे भेजी जाये इसकी व्यवस्था हम कर रहे हैं। महाराज अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें।" यह सन्देश पाकर महाराज को प्रसन्नता हुई। सवेरे जल्दी उठकर शिरकाण की ओर निकलना था। किन्तु शम्भू महाराज की धार्मिक वृत्ति भीतर जग गयी। उन्होंने प्रभावली की ओर जाने से पहले पाली के बल्लालेश्वर का दर्शन करने का प्रस्ताव महारानी से किया। दूसरे दिन पचीस विशिष्ट पालकियाँ और पाँच-छह सौ घुड़सवार पाली की ओर जाने के लिए निकले। खंडो बल्लाल भी साथ में थे। पाचाँड के बीच वाले रास्ते से आगे बढ़ने के पूर्व महाराज रायगढ़वाड़ी के मैदान में गये। वहाँ उन्होंने 'निश्चलगिरि स्वामी' की सम्भाजी :: 577