छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकिये। नौकरों ने बाहर बैठक की व्यवस्था की थी। वहाँ पर वे जोत्याजी केमकर और निलोपन्त के साथ बहुत देर तक बात करते हुए बैठे रहे। उसी समय मन्दिर के द्वार पर किसी के घोड़े की टाप सुनाई पड़ी। घोड़े से एक स्त्री उतरी। मशाल के उजाले में चेहरा स्पष्ट दिखाई दिया। महाराज ने आश्चर्य से पूछा, "गोदू तुम?" "हाँ!" "इधर कैसे आयी?" "महल में महारानी ने बताया कि आप यहाँ हैं और यहाँ पर आपको विलम्ब होगा, इसलिए—" "ठीक है। आ गयी, अच्छा किया।" महाराज के मन में कुछ असमंजस हुई। महाराज ने सोचा, शीघ्र ही औरंगजेब के साथ जीवन मरण का युद्ध छिड़ने वाला है। फिर कौन जाने गोदू जैसे आत्मीय व्यक्ति से कब मिलना हो पाए। महाराज बैठक मे उठ गये गोदू भी यन्त्र की भाँति उनके पीछे मन्दिर की सीढ़ियाँ उतरने लगी। अँधेरे में वे दोनों काली हौद की दिशा में दूर तक चलते गये। "गोदूऽ, अपने शिवाजी महाराज और उनके स्वराज्य के लिए तुमने अपनी जिन्दगी बर्बाद कर दी, किन्तु तुम्हें हमसे क्या मिला? केवल वनवास।" "महाराज भगाई गयी स्त्रियों के भाग्य में और होता भी क्या है? इसके पहले स्वराज्य पर अनेक खानों ने आक्रमण किया, भेड़िया जैसे बकरियों को उठाता है, उसी प्रकार हमारी बहू बेटियों को उठाकर ले गये। कुछ को छोड़ दिया। ऐसी गरीब और अभागी लड़कियों पर एक बार बदनामी का सिक्का लग गया कि बस! उन्हें न तो ससुराल वाले स्वीकारते हैं और न मायके वाले ही अपनाते हैं। ऐसी अनेक स्त्रियों ने पानी में डूबकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर दी। किन्तु महाराज!" "किन्तु हमारे स्वराज्य के लिए तुम्हारा मायका छूट गया।" "किन्तु महाराज मैं तो न सधवा हूँ न विधवा। भाग्यशाली अवश्य हूँ इसलिए महाराज आपकी और महारानी की परछाईं मे मुझे अपने जीवन का पुण्य मिल गया।" गोदू का मन भर आया था। कितने दिनों के बाद महाराज के ऐसे मुक्त साहचर्य का अवसर मिला था। वह समझ नहीं पा रही थी कि क्या कहे और क्या न कहे। वह बोली, "महाराज जब मैं पहली बार आपसे मिली तब मैं जवानी के उफान पर थी। जवानी के उस मादक आकर्षण में यदि कोई निर्दयी राजा मिला होता तो? तो उसने सहज ही मुझे बर्बाद कर दिया होता। उसे टोकने वाला कौन था? 576 :: सम्भाजी