छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकिन्तु तीन सौ वर्ष पूर्व इसी संगमेश्वर और विशालगढ़ की कठिन पहाड़ियों में घटी घटना को इतिहास कभी नहीं भूल सकता। आज भी यहाँ की पहाड़ियों, घाटियों और जंगली हवाओं को तीन सौ वर्ष पूर्व के प्रसंग का स्मरण होता है तो वे पागल कुत्ते की तरह भौंकने लगते हैं।" शम्भू महाराज ने पुराना प्रसंग छेड़ा तो कवि कलश भी उनका मुँह देखने लगे। शम्भू महाराज बहमनी साम्राज्य के सेनापति मलिक उत्तुजार की कहानी बताने लगे— मलिक उत्तुजार जिस समय अपनी सात हजार की सेना लेकर इस जंगल में आया था। उस समय खेलणा उर्फ विशालगढ़ किले पर शंकरराय मोरे का अधिकार था। उसी पर मलिक को आक्रमण करना था। उस समय मलिक अपनी सहायता के लिए श्रृंगारपुर के शिर्के से मिला। शिर्के ने बहमनी के सेनापति से खूब धन वसूला। विशालगढ़ का रास्ता दिखाने की शर्त स्वीकार की। किन्तु मलिक उन्हें ठीक समझ नहीं पाया था। आरम्भ में दो दिन शिर्के ने बहुत कठिन रास्ते में उन्हें भरमाया यह जंगल इतना घना था कि शेर भी इसमें घुसने से डरते थे। यहाँ के ऊँचे पर्वत और यहाँ की गहरी खाइयाँ इतनी भयानक कि भूत और राक्षस भी वहाँ जाने से घबराते थे। तीसरे दिन शिर्के ने मलिक उत्तुजार को ऐसा रास्ता दिखाया कि मुसलमान सैनिकों को नानी याद आ गयी। इस जंगल की विषैली हवा अजगर की फुफकार जैसी थी। ऊँची ऊँची घासों में मानो साँप के दाँत निकल आये थे। तीन ओर आसमान को छूते हुए पहाड़। रास्ता काँटों से भरा और पथरीला। कोस कोस तक मनुष्य की बस्ती का नामोनिशान नहीं। बहमनी सेना को ठीक से अनाज नहीं मिल पा रहा था। रात में मलिक के सैनिकों को तम्बू गाड़ने तक की जगह नहीं मिली। सैनिक जंगल की पत्तियाँ खाकर जान बचा रहे थे। थके माँदे सैनिक रास्ते पर लकड़ी के लट्ठे की तरह पड़े थे। अन्न पानी के अभाव मे सूखे अभागे सैनिक जब विश्राम कर रहे थे उसी समय दगाबाज शिर्के ने जाकर शंकरराय को सूचना दी, "कितने कठिन प्रयास से मैंने मलिक की फौज को आपके जबड़े में लाकर रख दिया है। अब जैसा चाहें वैसा बर्ताव उनके साथ करें।" अपनी सुसज्ज फौज के साथ उस जंगल में शीघ्रता से पहुँच गया। जैसे सूखने के लिए कपड़े फैलाए जाते हैं, उसी प्रकार थके माँदे, भूखे प्यासे सैनिक रास्ते पर अंग समेटे सोये पड़े थे। रात में ही मोरे की फौज ने ठंड से कुड़कड़ाते सैनिकों पर आक्रमण कर दिया। जैसे किसी मेले में हजारों बकरों को एक साथ काट दिया जाता है उसी प्रकार सात हजार सैनिकों को हलाल कर दिया गया। जिस समय अर्द्धजागृत सैनिकों की करुण चीत्कार हो रही थी उस समय हवा उल्टी बह रही थी। इसलिए उनकी आवाज किसी को सुनाई नहीं पड़ी। 582 .: सम्भाजी