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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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इस भीषण कथा को जब महाराज ने सुनाया तो कविराज और महारानी दोनों उदास हो गये। शम्भू महाराज ने दुखी स्वर में कहा, "बताइए येसूबाई, शिर्के की औलाद पर कोई कैसे भरोसा करे?" येसूबाई उदास भाव से हँसकर बोली, "हमारे मायके को ही आप क्यों दोष दे रहे हैं? मेरी ससुराल की बात भी कुछ अलग नहीं है। आज आपके सगे चचेरे भाई अर्जुन जैसे कुलभूषण किसके लिए लड़ रहे हैं? उस औरंगजेब के लिए ही न? शिवाजी जीजामाता आज किसकी सेवा में हैं? औरंगजेब की ही न?" "फिर भी येसू- " "महाराज जाति का महत्त्व नहीं होता। धर्म भी महत्त्वपूर्ण नहीं है। मनुष्य का कर्म ही महत्त्वपूर्ण होता है, यह आप जैसे संस्कृत पंडित को बताने की आवश्यकता नहीं है। ईश्वर ने मुझे गणोजी जैसा कृतघ्न भाई दिया है, फिर भी मैंने पिलाजीराव जैसे पुण्यवान पिता के घर जन्म लिया है। आज पिलाजी शिर्के की पुत्री येसूबाई रायगढ़ की महारानी बनी है। यह येसूबाई अपने कुल का नाम उज्ज्वल किये बिना नहीं रहेगी।" शम्भू महाराज ने पुनः अपना रुख कवि कलश की ओर किया। उन्होंने कहा, "इससे पहले भी शत्रुओं ने अनेक बार आक्रमण किया था। रायगढ़ में प्रवेश करने का प्रयास किया था। उन्हें सबसे पहले प्रभावली का ही मार्ग दिखा।" कवि कलश बीच में ही बोल पड़े, "हमने रायगढ़ की कालनदी के किनारे कभी शत्रुओं की दाल गलने नहीं दी।" "किन्तु कविराज, उस समय हमारे किसी गाँव वाले या जमींदार दुश्मन को आश्रय नहीं दिया था। आज तो हमारे सगे साले शत्रु की उँगली पकड़कर उसे अपने राजमन्दिर की ओर ले आ रहे हैं।" "गणोजी को कौन पूछता है?" येसूरानी ने कहा। "नहीं येसू, शत्रु और धोखेबाज को नज़रअन्दाज नहीं करना चाहिए। महल की रक्षा प्राचीर में थोड़ी भी दरार रहने से विषैले साँप की तरह शत्रु प्रवेश कर सकता है, हानि पहुँचा सकता है।" "तो महाराज रंचमात्र भी शिथिलता न करें। शिर्केवंश पर आक्रमण का दायित्व आप मुझे दें। मैं स्वयं जाऊँगी प्रभावली।" "महारानी?" महाराज ने तिरछी नजर से देखा। "महाराज, यह येसूबाई शिवाजी महाराज की पुत्रवधू है। इसके साथ ही तलवार चलाने की शिक्षा मेरे पिता पिलाजीराव ने बचपन में दे दी है।" सम्भाजी महाराज विचारमग्न हो गये। उन्होंने कहा, "येसू, आपका विचार सम्भाजी :: 583