छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
इस भीषण कथा को जब महाराज ने सुनाया तो कविराज और महारानी दोनों उदास हो गये। शम्भू महाराज ने दुखी स्वर में कहा, "बताइए येसूबाई, शिर्के की औलाद पर कोई कैसे भरोसा करे?" येसूबाई उदास भाव से हँसकर बोली, "हमारे मायके को ही आप क्यों दोष दे रहे हैं? मेरी ससुराल की बात भी कुछ अलग नहीं है। आज आपके सगे चचेरे भाई अर्जुन जैसे कुलभूषण किसके लिए लड़ रहे हैं? उस औरंगजेब के लिए ही न? शिवाजी जीजामाता आज किसकी सेवा में हैं? औरंगजेब की ही न?" "फिर भी येसू- " "महाराज जाति का महत्त्व नहीं होता। धर्म भी महत्त्वपूर्ण नहीं है। मनुष्य का कर्म ही महत्त्वपूर्ण होता है, यह आप जैसे संस्कृत पंडित को बताने की आवश्यकता नहीं है। ईश्वर ने मुझे गणोजी जैसा कृतघ्न भाई दिया है, फिर भी मैंने पिलाजीराव जैसे पुण्यवान पिता के घर जन्म लिया है। आज पिलाजी शिर्के की पुत्री येसूबाई रायगढ़ की महारानी बनी है। यह येसूबाई अपने कुल का नाम उज्ज्वल किये बिना नहीं रहेगी।" शम्भू महाराज ने पुनः अपना रुख कवि कलश की ओर किया। उन्होंने कहा, "इससे पहले भी शत्रुओं ने अनेक बार आक्रमण किया था। रायगढ़ में प्रवेश करने का प्रयास किया था। उन्हें सबसे पहले प्रभावली का ही मार्ग दिखा।" कवि कलश बीच में ही बोल पड़े, "हमने रायगढ़ की कालनदी के किनारे कभी शत्रुओं की दाल गलने नहीं दी।" "किन्तु कविराज, उस समय हमारे किसी गाँव वाले या जमींदार दुश्मन को आश्रय नहीं दिया था। आज तो हमारे सगे साले शत्रु की उँगली पकड़कर उसे अपने राजमन्दिर की ओर ले आ रहे हैं।" "गणोजी को कौन पूछता है?" येसूरानी ने कहा। "नहीं येसू, शत्रु और धोखेबाज को नज़रअन्दाज नहीं करना चाहिए। महल की रक्षा प्राचीर में थोड़ी भी दरार रहने से विषैले साँप की तरह शत्रु प्रवेश कर सकता है, हानि पहुँचा सकता है।" "तो महाराज रंचमात्र भी शिथिलता न करें। शिर्केवंश पर आक्रमण का दायित्व आप मुझे दें। मैं स्वयं जाऊँगी प्रभावली।" "महारानी?" महाराज ने तिरछी नजर से देखा। "महाराज, यह येसूबाई शिवाजी महाराज की पुत्रवधू है। इसके साथ ही तलवार चलाने की शिक्षा मेरे पिता पिलाजीराव ने बचपन में दे दी है।" सम्भाजी महाराज विचारमग्न हो गये। उन्होंने कहा, "येसू, आपका विचार सम्भाजी :: 583
बुरा नहीं है। गणोजी आज नीचता की हद पर पहुँच गया है। उसका मुँह तोड़ने के अतिरिक्त हमारे पास कोई विकल्प ही नहीं है। किन्तु यदि आप वहाँ जाएँगी तो रायगढ़ का राजकीय कार्यभार कौन सँभालेगा?'' ''क्या मतलब महाराज?'' ''आज मराठा राज्य की महारानी की अपेक्षा मुख्य दीवान का दायित्व आप पर अधिक है। इसके अतिरिक्त राजकीय कार्यभार सँभालने वाला कोई समर्थ और भरोसेमन्द व्यक्ति बचा भी तो नहीं है।'' येसूबाई कुछ बोली नहीं। तब सम्भाजी महाराज ने आशाभरी दृष्टि से कविराज की ओर देखा। कविराज के चेहरे का रंग बदल गया। महाराज ने दुख से कहा, ''क्षमा करें कविराज, सभी अप्रिय कार्य करने की जिम्मेदारी दुर्दैव से आपके ही ऊपर आती है। इससे पहले हंबीरराव जैसे आत्मीय व्यक्ति पहाड़ की तरह हमारे पीछे खड़े होते थे। किन्तु दुष्ट काल ने उन्हें हमसे छीन लिया। कोंडाजी बाबा जैसे रत्न को हमने जंजीरे के लिए खो दिया। धनाजी, सन्ताजी और खंडो बल्लाल जैसे तरुण योद्धा किसी न किसी मोर्चे पर स्वराज्य के लिए लड़ रहे हैं। इसलिए आपके अतिरिक्त और कोई भरोसे का आदमी बचा ही नहीं है।'' महाराज के विषण्ण सुर से कविराज उत्साहित हो गये। वे शम्भू महाराज के सामने झुककर, उनका वन्दन करते हुए बोले, ''आज्ञा करें, राजन, केवल आज्ञा करें।'' ''कल सवेरे पाचाड़ से निकालिए। पन्द्रह हजार की सेना लेकर औरंगजेब और गणोजी के फौजी समझौते होने से पहले ही प्रभावली पहुँच जाइये। शिर्के के बचे खुचे तबेले और महल बेचिराग कर दीजिए। हिन्दवी स्वराज्य का गला घोंटने से पहले ही, शिर्के के सारे षड्यन्त्र को ध्वस्त कर दीजिए। शिर्के का सारा इलाका आग के हवाले कर दीजिए।'' पाँच लालबारी की दशा अत्यन्त शोचनीय हो गयी थी। बहुत से शाही हकीम और हिन्दू वैद्य वहाँ से दबे पाँव लौट रहे थे। बादशाह का दल ही नहीं पूरी लालबारी कराहती-सी प्रतीत हो रही थी। बुखार के ऐसे रूप का मुगल सेना ने कभी अनुभव 584 :: सम्भाजी
ही नहीं किया था। फौज के कुछ फिरंगी तोपची इस रोग को प्लेग कहते थे। लालबारी के पास का आकाश दीप भी रोग के साथ ही अन्धे की भाँति टिमटिमाता हुआ रातभर इधर-उधर देखता रहता था। बादशाह को भी थोड़ा ज्वर आ गया जिससे सभी परेशान हो गये। अब तक करीब सत्तर हजार मुगल सैनिक इस रोग की-चपेट में आ गये थे। हवा में चारों ओर दुर्गन्ध फैल गयी। सैनिकों के कराहने की आवाज इतनी बढ़ गयी कि वहाँ रहना कठिन हो गया। मृत्यु का भय या उसकी भयानकता का अनुभव अब किसी को होता ही नहीं था। लोग इतने भावनाशून्य हो गये थे कि मृत्यु पर भी कोई शोक नहीं करता था। किया भी तो कौन किसकी सुनता? प्रत्येक तम्बू में खुली जगह में, तम्बुओं की आड़ में सभी जगह दुर्गन्ध फैल गयी थी। मृत्यु की काली छाया सभी ओर पहुँच गयी थी। चार-छह दिनों में ही पूरा क्षेत्र एक बड़े कब्रिस्तान में बदल गया था। मृत्यु की छाया एक पागल बन्दर की तरह औरंगजेब के पीछे पड़ी थी। बादशाह के दो पोतों की मृत्यु हो गयी। असदखान भी प्लेग के बुखार में तड़पते हुए अपने डेरे में पड़ा था। बादशाह ने एक महीने में चार बार अपनी जगह बदली थी। पिछले सप्ताह से औरंगजेब बहुत बेचैन हो गया था। एक ओर मैदान में हजारों लाशें पड़ी थीं और दूसरी ओर लाशों को खाने वाले गीदड़ और कुत्ते भी वहाँ फटक नहीं रहे थे। इस शैतानी बीमारी का कोई इलाज भी नहीं था। अपने मन को सान्त्वना देने के लिए लोग हकीम से किसी वनौषधि का पत्ता माँगकर ले जाते थे। उसे चूसते हुए ठनकती गाँठों को काँख या जाँघ में दबाकर सो जाते थे। दो-चार दिन में मौत आ जाती थी। तम्बू में यदि कोई समीपी व्यक्ति हुआ तो शव को खींचकर ले जाता था। कब्र के नाम पर कहीं पर सिर्फ मिट्टी ढक देता था। किन्तु दफनाने के लिए भी जगह नहीं मिल रही थी। मुर्दों को खींचकर ले जाने के लिए भी कोई नहीं मिलता था। मुर्दा ढोने वाले भी मुर्दा ढोते-ढोते महामारी से ग्रस्त होकर मर रहे थे। भिश्ती समाप्त हो चुके थे। बादशाह अपने शाही डेरे की कनात की खिड़की से दूर देख रहा था। महामारी से टूटा हुआ बीजापुर साफ दिखाई पड़ रहा था। उस नगर के सामर्थ्य और अभिमान का प्रतीक गोलगुम्बद भी काला पड़ गया था। औरंगजेब को बहुत सूनेपन और अकेलेपन का अनुभव हो रहा था। उसकी दोनों प्यारी बेगमें उदयपुरी और औरंगाबादी घबराकर उसके सिरहाने बैठी थीं। बादशाह को बुखार आ गया था। किन्तु महामारी की गाँठ बादशाह को न आये इसके लिए अल्लाह से दुआ माँग रही थीं। सम्भाजी :: 585
बादशाह बहुत टूट गया था। महीने-डेढ़ महीने में सत्तर हजार फौज समाप्त हो चुकी थी। दुखी औरंगजेब ने आकाश की ओर देखा। गहरी साँस लेते हुए उसने कहा, "उदयपुरीऽ इतनी बड़ी लड़ाइयाँ हमने जीतीं। गोलकुंडा के उस मूर्ख तानाशाह को एक बार नहीं दो बार पराजित किया। वहाँ खाई में आधे हैदराबाद को गाड़ दिया। बीजापुर की अभिमानी तटबन्दी को ध्वस्त कर दिया। वहाँ का खजाना हासिल किया। कुतुबशाह और आदिलशाह दोनों गीदड़ के बच्चे की तरह आज हमारी कैद में पड़े हैं। किन्तु इस आसमान जैसी बड़ी विजय का फायदा क्या?" "हजरत आप अधिक बात न करें। आराम करें—" उदयपुरी बेगम ने हाथ जोड़कर कहा। "बेगम, आज दो बड़ी सल्तनतों की मिली विजय पर हँसें या प्लेग द्वारा कमर तोड़ दिये जाने पर रोयें?" बादशाह को किसी तरह समझाया गया। किन्तु उसी समय जुल्फिकारखान वहाँ आ गया। उसने रोज की तरह मरने वालों की संख्या का आँकड़ा प्रस्तुत किया। "किब्लाए आलम आज केवल दो हजार।" "लड़ाई के मैदान में दो हजार सिपाही बिना लड़े मर जायें तो यह कोई मामूली संख्या नहीं होती, बेवकूफ नौजवान!" बादशाह ने क्रोधावेश में कहा, "जुल्फिकारखान तुम अपने परवरदिगार से पूछो कि हमारी छावनी में हजारों सैनिक मक्खियों की तरह मर रहे हैं फिर वहाँ उस जहन्नमी सम्भा को मौत क्यों नहीं आती?" कमजोरं और बीमारी से जर्जर फौज को लेकर आगे बढ़ना सम्भव नहीं था। प्लेग मानो सम्पूर्ण मानवजाति को समाप्त करने के लिए ही आया था। लोगों को दो तीन दिन तक ज्वर आता था। उससे कुछ भाग्यशाली बच भी जाते थे। किन्तु काँख की गाँठ के साथ सारे शरीर में फैलने वाला विचित्र बुखार सचमुच जानलेवा था। जो भाग्य से बच गया तो भी उसके शरीर की सारी शक्ति निकल जाती थी। वह व्यक्ति इतना क्षीण और शक्तिहीन हो जाता था कि वह चलती-फिरती लाश बन जाता था। मैदान में हजारों लोग कराहते हुए पड़े थे। इस विचित्र अवस्था ने बादशाह को पागल बना दिया था। किन्तु बादशाह इस बात को क्षणमात्र के लिए भी नहीं भूला था कि इस अवस्था से बाहर निकलकर सबसे बड़े तीसरे शत्रु को विनष्ट करना है। इसलिए अपने कार्यव्यापार और पत्राचार से उसका ध्यान जरा भी नहीं हटता था। असदखान डेरे में बीमार होकर पड़ा था। उसका काम जुल्फिकार सँभाल रहा था। अपने मौसेरे भाई को सामने बैठने का संकेत करते हुए औरंगजेब ने कहा, 586 :: सम्भाजी
"आज सवेरे अपनी मेवाती और मुल्तानी फौज के मुखिया मुझसे मिलने आये थे। उन्हें दो महीने से तनख्वाह क्यों नहीं दी गयी? तनख्वाह के लिए फौजियों को कितने दिन इन्तजार करना चाहिए?" "हुजूर अब तक आधा खजाना खाली हो चुका है-अभी आगे-?" "क्या बकते हो? जुल्फिकार, अरे दक्षिण के दो विख्यात राज्यों को हमने जीता। उनका खजाना लूटकर ले आये। फिर भी खजाना खाली ?" "जहाँपनाह, पिछले दो महीने से बंगाल से आने वाली वसूली आयी ही नहीं। अपना सूबेदार खुर्शीद कुलीखान वहाँ टालमटोल कर रहा है। बाकी के हमारे सारे हिन्दुस्तानी सूबेदार भी नियमित रूप से गशि भेज नहीं रहे हैं। उन्हें लगता है-उन्हें" "हाँ, बोलो, बोलो। अपने मन की बात साफ-साफ कहो।" "हुजूर उन्हें लगता है कि बीजापुर, गोलकुंडा जीत लिया तो भी बीच में अभी मराठे हैं। उस जहन्नमी सम्भा की फौज को पार करके अपनी शाही फौज का दिल्ली पहुँचना इतना सरल नहीं है।" यह कहते हुए जुल्फिकार का चेहरा भय के कारण पसीने से भीग गया। बादशाह ने क्रोध से अपनी आँखें घुमाईं। अपने क्रोध को उसी तरह दबा लिया जैसे विष का प्याला सहज रूप से पी लिया हो। उसने जुल्फिकार की सहायता से एक बड़ा षड्यन्त्र रचा था। यह षड्यन्त्र था रायगढ़ से राजाराम को उठाकर ले आने का। उनका नाम सामने रखकर मराठा राज्य की दूसरी गद्दी स्थापित करने की योजना थी। बादशाही का संरक्षण देकर पूना के आसपास दूसरी राजगद्दी बनानी थी। अनुमान था कि इससे औरंगजेब की शरण में पहले ही आ चुके गद्दार और सम्भाजी से असन्तुष्ट मराठे और ब्राह्मण एकत्र हो आएँगे। वे भी प्रसन्न होंगे। सम्भाजी की शक्ति कम हो जाएगी। हिन्दवी स्वराज्य अपने आप ध्वस्त होने लगेगा। किन्तु फौलादी सुरक्षा वाले रायगढ़ से राजाराम को उठा ले आना, गुलबकावली के फूल प्राप्त करने जितना ही कठिन था। फिर भी निर्भीक सीने वाले बीस पठान और तुर्की फौजी रायगढ़ की ओर चले गये थे। उनका स्मरण करते हुए औरंगजेब ने पूछा, "वहाँ की कुछ खबर ?" "जहाँपनाह, योजना आपके दिमाग की उपज है। उसकी तामील हम बड़ी सावधानी और होशियारी से कर रहे हैं। हमारा जैनुद्दीन गोलकुंडा का सरदार खवासखान के रूप में कभी का चला गया है। उसके साथ उन्नीस बहादुर सिपाही हैं।" "उस सम्भा को सन्देह हो गया तो-?" सम्भाजी ·· 587
"सम्भा की गैरहाजिरी में हमारा जैनुद्दीन राजाराम से भेंट करेगा। वह भी नीचे पाचाड़ के महल में। क्योंकि रायगढ़ पर षड्यन्त्र करके नीचे आ पाना बहुत कठिन है। सम्भा किले पर रहता ही नहीं। इसी का फायदा उठाना है।" "हर कदम फूँक-फूँककर रखो।" "जहाँपनाह, उसकी फिक्र न करें। महादजी निंबालकर के पास बैठकर पाचाड़ का नक्शा बनाया गया है। वहाँ पर उस काफिर सम्भा ने अपनी दादी की याद में मन्दिर बनवाया है। खुली हवा का सेवन करने राजपरिवार कभी-कभी वहाँ आता है। महादजी उनका जमाई है। उसने सभी बारीक बारीक बातें नक्शे में दिखा दी हैं।" निजी बैठक समाप्त हो गयी। बादशाह उठकर बड़े उत्साह से चलता हुआ सामने कचहरी के डेरे में पहुँच गया। वह जुल्फिकार के साथ कागज पत्र देखने लगा। इसी समय एक पत्र को सामने करते हुए जुल्फिकार ने कहा, "जहाँपनाह यह देखिए, सम्भाजी के साले गणोजी शिर्के का यह पत्र-" पत्र पढ़ने से पहले ही बादशाह ने पूछा, "वह गणोजी कोंकण के जंगलों में हमारे लिए दो चौकियाँ बनाने में मदद करने वाला था। उसका क्या हुआ?" "हजरत गणोजी तो बहुत चाहता था। किन्तु उस कवि कलश एवं सम्भा ने उसे बहुत परेशान कर दिया है। उसने लिखा है-" "हाँ, पढ़ो-" "सारी धरती के बादशाह, आलमगीर औरंगजेब बहादुर बालक गणोजी नतसिर अभिवादन। बादशाह सलामत! अब मेरे जैसे खानदानी मराठा की आप अधिक परीक्षा न लें। कृपा करके हमारी सहायता कीजिए। इस पत्र से हुजूर को स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि हमारा मराठों का राजा सम्भाजी एकदम पागल हो गया है। उसे समाप्त कीजिए। हमारे राजा ने कवि कलश नाम के मूर्ख को आत्मीय मित्र बना लिया है। ये दोनों हमारे शिर्के प्रदेश का नाश कर रहे हैं। उन्होंने आगजनी और लूटपाट करके हमारा जीना हराम कर दिया है। रोज हमारे घर जल रहे हैं, फसलें राख हो रही हैं, तबेले आग के हवाले हो रहे हैं। जंजीरे का सिद्दी हमारा मित्र है इसलिए हमारी स्त्रियों और हमारे बच्चों को उनके किले में सुरक्षा मिल गयी है। नहीं तो इस दुष्ट सम्भा ने हमें जन्मभर बिना जागीर के रखा। हमारे लिए यहाँ न घर न द्वार। शिवा सम्भा ने हमें जंगली जानवरों की तरह दर दर भटकने के लिए विवश कर दिया है।" 588 :: सम्भाजी
पत्र पढ़ लिया गया। औरंगजेब ने आँखें ऊपर उठाकर जुल्फिकार से पूछा, “जुल्फिकार, इस गणोजी की सेना कितनी बड़ी है?'' “गणोजी की फौज—फौज” जुल्फिकारखान रुकते हुए बोला, “होगी हजार-बारह सौ की लाठी-लकड़ियों वाली भीड़। फौज कहने लायक कोई भी चीज उनके पास नहीं है।'' “हूँ, जुल्फिकार इस प्लेग की चपेट से मुक्त होते ही हमें सम्भा की ओर कूच करना है।'' “जी, हुजूर।” बादशाह बैठक में ही था कि भीतर बदहवास नौकर दौड़ते हुए आये। नौकरों के भयभीत चेहरे को देखकर बादशाह घबरा गया। तुरन्त उठकर भीतर की ओर चलता बना। उसे जानना था कि गाँठ का ज्वर उदयपुरी को आया है या औरंगाबादी महल को। बादशाह ने भीतर जाकर देखा। औरंगाबादी बेगम को भयंकर ज्वर चढ़ा था। उसकी काँख के नीचे सुर्ख गाँठ फूल आयी थी। औरंगाबादी बेगम असह्य पीड़ा से बिस्तर में छटपटा रही थीं। जुल्फिकार ने शाही हकीम के पास सन्देश भेजा। किन्तु बहुत समय बीत जाने पर भी हकीम नहीं आया। तब फौलादखान ने सिर नीचा करके कहा, “हुजूर कल रात को शाही हकीम इस जालिम रोग से अल्लाह को प्यारे हो गये।'' “उसके बेटे को बुलाइये।” “हुजूर वह सवेरे ही अपने बाप को दफनाकर वापस आया। अब उसकी भी जाँघ में गाँठ उठ गयी है। बेचारा अपने डेरे में मुर्गी की तरह छटपटा रहा है।” अन्त में जो होना था हो गया। गाँठ के इस दानवी रोग ने काला-गोरा, हिन्दू-मुसलमान, राजा-रंक जैसा कोई भेद किया ही नहीं था। उसने अपने जबड़े में बादशाह की लगभग पचहत्तर हजार सेना निगल ली थी। उसी में औरंगाबादी बेगम के रूप में एक और का इजाफा हुआ। दूर देश की ऊबड़-खाबड़ जमीन पर औरंगाबादी बेगम को दफन किया गया। कब्र की एक मुट्ठी गीली मिट्टी लेकर औरंगजेब खूब रोया। सभी को लगा कि बेगम के वियोग ने उसे विकल कर दिया है। किन्तु बादशाह अपने भीतर की घोर वेदना को बाहर निकाल रहा था। पिछले छह-सात वर्षों में की गयी बादशाह की सारी कोशिश, उसकी प्रचंड महत्त्वाकांक्षा और झोली में आयी नगण्य सफलता। दैवी शक्ति के सामने मनुष्य की विवशता, दुःख, विफलता, निराशा आदि का वह सारतत्त्व था। दस-पन्द्रह दिन और बीते। महामारी धीरे-धीरे समाप्ति पर आयी। सौभाग्य सम्भाजी : 589
से वजीर असदखान उसकी चपेट से बच गया। किन्तु फिरोजजंग हमेशा के लिए अन्धा हो गया। किसी को अन्धा, किसी को बहरा करके और हजारों को सदा के लिए अपने साथ लेकर महामारी चली गयी। बादशाह के पास प्रतिदिन नये समाचार आ रहे थे। सम्भाजी भी अकाल की बाधा से बाहर निकल रहे थे। किन्तु उनके खंडो बल्लाल, निलोपन्त पेशवा, केसो त्रिमल और सेनापति म्हालोजी घौड़पड़े के कार्यों में गति नहीं आ रही थी। मराठों ने सावधानी और आक्रामक तरीके से सर्जाखान को कब्जे में कर रखा था। ऐसे संकेत मिल रहे थे कि सम्भाजी बादशाह के विरुद्ध कोई बड़ी योजना बना रहे हैं। सम्भाजी की आक्रामकता से बूढ़े बादशाह में नया जोश आ गया। 14 सितम्बर, 1688 के दिन कूच के नगाड़े बज गये। लाखों जानवरों और मनुष्यों के साथ औरंगजेब, नयी आशा से महाराष्ट्र के पठार की ओर बढ़ने लगा। छह जत के मैदान में बादशाह का डेरा पड़ा था। लगभग बीस मील तक शाही फौज के डेरे-डंडे फैले थे। मध्यभाग में बादशाह का लालरंग का तम्बू अधिक मटमैला दिख रहा था। लम्बी यात्रा के कारण ऊँट हड़बड़ा गये थे, घोड़े शिथिल पड़ गये थे। भरपूर पानी न मिलने के कारण हाथी भी त्रस्त दिखाई पड़ रहे थे। दो सौ से अधिक फौजी बाजार सूने-सूने लग रहे थे। शाही फौज का पहले वाला उत्साह, जोश, शान आदि कुछ भी शेष नहीं था। जैसे किसी सुन्दर पुरुष की कान्ति पर चेचक के दाग पड़ गये हों और बुढ़ापे के कारण उसका चेहरा सूख गया हो, उसी तरह शाही फौज का सारा उत्साह सूख चुका था। प्रतिदिन की तरह सवेरे अपना नियमित नमाज अदा करके, कपड़े पहनकर, बादशाह शिविर के दरबार की ओर जाने के लिए निकला। उसी समय उदयपुरी बेगम वहाँ पर आ गयीं। उन्होंने बादशाह के उड़ते बालों को 'हाथ से सँवारते हुए कहा, "हजरत, आज आपने आईना नहीं देखा क्या?" इन शब्दों को सुनते ही औरंगजेब ने उदयपुरी के हाथ को झटककर पीछे कर दिया। उसके इस रूप को देखकर उदयपुरी बेगम घबरा गयीं। वह हाथ जोड़कर थरथर काँप रही थीं। तब बादशाह क्रोध में ही गुर्राया, "बेगम साहिबाऽ आप कैसा 590 :: सम्भाजी
सवाल कर रही हैं? पिछले पाँच वर्षों में इस आलमगीर ने कभी आईना देखा? ऐसा कोई दिन याद है आपको?'' ''हजरत क्षमा करें।'' ''बेगम साहिबा, कैसे और किस मुख से आईने मे अपना चेहरा देखूँ?'' विफलता के विषाद से तडपते हुए बादशाह ने कहा, ''आज सारी दुनिया में शायद ही किसी के पास मेरी जितनी बड़ी हुकूमत हो। फिर भी यह शहंशाह बिना राजमुकुट के पिछले पाँच वर्षों से दक्खिन की इस नादान धरती पर दर दर भटक रहा है। कैसा शहंशाह और कैसी सल्तनत? राज्य होने पर भी सिर पर मुकुट पहनने का अवसर नहीं। तो भी बेशर्म की तरह आईने में अपना मुँह देखना चाहिए?'' ''मेरे आका मुझे माफ कर दो ऐसी गलती आगे नहीं होगी।'' बादशाह ने स्वयं को सँभाल लिया। वह उदास भाव से कुछ धीमे स्वर में बोला, ''बेगम साहिबा, आईने में देखते हुए काफिर हिन्दुओं की स्त्रियाँ जब अपने माथे पर कुंकुम नहीं देखतीं और अनुभव करती हैं कि उनका पति जिन्दा नहीं है तो उन्हें अत्यन्त दुख होता है। मेरी स्थिति भी उन्हीं काफिर स्त्रियों जैसी हो गयी है। बिना मुकुट के अपने सिर को देखते हुए मुझे भी बड़ी ग्लानि होती है।'' खिन्न बादशाह धीरे धीरे चलते हुए, बैठक में आकर बैठ गया। असदखान ने महामारी से अपनी आँखों को किसी प्रकार बचा लिया था। किन्तु आज वह बहुत नाराज दिखाई पड़ रहा था। मेंहदी लगी अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए और असदखान पर नजरें टिकाए, बादशाह ने कहा, ''वजीरे आजम आप साफ-साफ क्यो नहीं कहते कि उस काफिर सम्भा से आज भी हमारी फौज घबराती है।'' ''जी हाँ जहाँपनाह, सभी घबराते हैं उस सम्भा से और वह जिस पहाड़ी पर रहता है उस सह्याद्रि पर्वत से।'' आप भी तो आजकल फौज की सारी खबरें मुझ तक कहाँ पहुँचाते हो, वजीरे आजम? ऐसा कैसे होगा जहाँपनाह? आपको कुछ गलतफहमी-'' ''फिर बताइये-ये क्या है-कबड़ी और कबरी?'' अब तो वजीर की जबान रुक गयी। उसे इस बात का आश्चर्य हुआ कि इतनी छोटी छोटी बाते भी बादशाह के कान तक पहुँचती हैं। उसे स्वप्न में भी इसकी कल्पना नहीं थी। वजीर पर अपनी कड़ी नजर डालते हुए बादशाह ने कड़े स्वर में पूछा, ''क्या है यह कबड़ी और कबरी?'' वजीर का चेहरा ऐसा हो गया जैसे भट्ठी मे तपता हुआ कोई हथियार पकड़ लिया हो। घबराकर वजीर बताने लगा, ''जहाँपनाह हमारे फौजी विश्राम के समय में एक खेल खेलते हैं। हाथ की छड़ी से धूल में छोटे-छोटे गोले बनाते हैं। हर सम्भाजी 591
गोले की दक्षिणी दिशा को नदी का नाम दिया जाता है। कौड़ियों को इकट्ठा करके गोले में फेंकते हैं। सिपाहियों का विश्वास है कि जिस सिपाही की कौड़ी गोले में पड़ेगी, उसकी कब्र उसी नदी के किनारे बनेगी। क्या बताऊँ आलम पनाह? हमारी सारी फौज भयाक्रान्त है। हर एक भीतर ही भीतर तड़प रहा है। सभी एक दूसरे से पूछते रहते हैं कि 'हम गंगा-यमुना की ओर जिन्दा लौटेंगे या यहीं कहीं लावारिस की तरह हमारी लाश गिरेगी'?" "वजीर यह बात यहीं तक सीमित नहीं है। तुम्हारे फौजी यह भी जानने का खेल खेलते हैं कि बादशाह की कब्र कहाँ खोदी जाएगी? क्यों? बोलो! बोलो!!" हताश बादशाह व्यंग्यपूर्ण हँसी हँसकर बोला, किन्तु उसके क्रोध के पीछे जो वेदना थी उसे छुपा पाना सम्भव नहीं था। विषय को बदलते हुए बादशाह ने वजीर से पूछा, "वजीर, नासिक और बागलाण की क्या खबर है?" "जहाँपनाह, आपके वफादार महावतखान ने वहाँ पर बड़े जोश से काम किया है। त्र्यंबक के किले पर पिछले छह महीने से घेरा डाल रखा है। रसद का एक दाना भी किले पर नहीं पहुँच रहा है। किले पर मराठे भूख से छटपटा रहे हैं। दो दिनों में ही किला कब्जे में आ जाएगा।" इसी बीच बादशाह का तीस वर्षीय पोता मोमिन खान दौड़ते हुए आया और बड़े उत्साह से कहने लगा, "मुबारक हो जहाँपनाह। बहुत अच्छी खबर-" "क्यों, क्या हुआ?" अपने पोते पर दृष्टि खड़ाते हुए बादशाह ने पूछा, "ओ जहन्नमी सम्भा अल्लाह को प्यारा हुआ या पकड़ा गया?" "नहीं, नहीं, वैसा नहीं, लेकिन दादाजान-" पोता हकलाया। "वैसा नहीं तो तुरन्त अपना मुँह काला करके निकल जाओ। इस किले पर घेरा डाला, उस किले पर घेरा डाला, ऐसी बकवास अब बन्द करो। बेवकूफो, उस पापी शिवा और सम्भा के तीन सौ से भी अधिक किले हैं। तुम्हारी इन फिजूल की बातों को सुनते-सुनते जिन्दगी समाप्त हो गयी, शैतानो।" मोमिन खान उल्टे पैर भाग गया। क्रोधित बादशाह उखड़ते हुए फिर वजीर से बोला, "पाँच लाख की फौज और पिछले आठ-नौ वर्षों का समय? हमारे तैमूरवंश में बाबर हुए, अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ, इतने खुदा के बन्दे आकर गये। पिछले दो सौ वर्षों से हमने हिन्दुस्तान पर राज्य किया। परन्तु इस तरह की आठ- नौ वर्षों की जालिम लड़ाई देखी थी किसी ने?" "बादशाह सलामत थोड़ा धीरज धारण करें।" असदखान ने आत्मीयता से कहा। "वजीर, आपको मालूम नहीं, हमारी सारी फौज को पागल होना ही बाकी है। पिछले आठ वर्षों से हमारे सैनिकों को घर मकान, बाले-बच्चे, किसी भी बात 592 :: सम्भाजी
का कुछ पता नहीं है। फौज ने रास्ते में मिली कितनी औरतों और बाजारू वेश्याओं को बर्बाद कर दिया। बहुत-सी मर गयीं। बहुत से फौजियों को असाध्य रोग ने जकड़ लिया है। रात के अँधेरे में पुरुष ही पुरुषों पर अत्याचार कर रहे हैं। यहाँ शैतानी बारिश, महामारी और यहाँ के भयानक अकाल से सारी फौज जर्जर हो गयी है। उनका मनोबल टूट चुका है। यदि समय पर इस स्थिति से सँभाला न गया तो एक दिन ये सारे सैनिक सन्तप्त होकर बादशाह को ही जिन्दा दफन कर देंगे।" अल्लाह ने बादशाह को बड़े जटिल चक्कर में फँसा दिया था। उसकी फौज में निरन्तर विवाद बढ़ रहे थे। अमदखान पहले शहंशाह से बड़े अदब से बोलता था। किन्तु परिस्थिति के कारण वह भी बदल गया था। वह फौज की समस्या को बादशाह से कह रहा था। "मेरे आका, अब ज्यादा समय तक फौज को रोके रखना कठिन है।" "हम किसी भी युक्ति से उस सम्भा को सह्याद्रि पर्वत से बाहर निकालेंगे।" "उसकी भी सारी कोशिशें बेकार हो गयीं। सम्भा बाहर आता ही नहीं। वहाँ पर फौजी चौकियाँ बनाने में भी कोई हमारी सहायता नहीं कर रहा है। वह गणोजी शिर्के भी डरपोक निकला, किबला ए आलम।" "इसे कितनी बड़ी बदकिस्मती कहा जाय, वजीरे आजम? वर्षों से उस शिवाजी के दो जामाता हमारे साथ हैं। तीसरा भी हमें ही चाहता है। उसके दस- बारह बड़े सरदार भागकर हमारे साथ आ गये हैं। फिर भी उसका लौंडा सम्भा हमारी पकड़ में नहीं आ रहा है?" बादशाह ने कड़कते हुए कहा, "कुछ भी करो, साम, दाम, दंड, भेद किसी भी हथियार का इस्तेमाल करो किन्तु शिकार हाथ में आना चाहिए।" दंड भेद नीति की बात करते करते बादशाह को अचानक स्मरण हुआ, "जुल्फिकार, क्या हुआ उस खवासखान का?" "जहाँपनाह, वह पाचाड़ के करीब पहुँच गया है।" "आगे की बात कर, कमबख्त।" एकाएक बादशाह की आँखें चमकीं। "सम्भा को छोड़ो, कम से कम राजाराम को तो हाथ में आने दो। वह छोकरा मुट्ठी में आ जाये तो मराठों का दूसरा राजसिंहासन स्थापित करूँ। तब हम गुर्राने वाले उस सम्भा को भी ठिकाने लगाएँगे।" दो दिन में ही बहादुरगढ़ से महादजी निंबालकर और पन्हाला से गणोजी शिर्के आकर मिलने वाले थे। सचमुच उन्हें तुरन्त मिलने का आदेश बादशाह ने ही दिया था। बादशाह अपने समीपी सहयोगियों से बार-बार कह रहा था कि, "रामशेज के किले ने हमें यह सबक सिखा दिया है कि मराठों का यह मूर्ख महाराष्ट्र तोपों के गोलों से नहीं झुकता। झुकेगा भी नहीं। किन्तु षड्यन्त्रों और सम्भाजी :: 593
धोखों से उनकी कमर तोड़ी जा सकती है।'' एक बार फिर बादशाह की नींद उड़ गयी। वह महाराष्ट्र के अनेक जमींदारों और जागीरदारों को पत्र लिख रहा था— "खानदानी मराठो! हमारे पास आओ। हम आपका सम्मान करते हैं। मुगलों की सल्तनत आपके लिए परायी नहीं है। यह आलमगीर आपको पराया क्यों लगता है? अपने मन के सन्देह को मिटा दीजिए। भाइयो आइये और अपनी जागीरों को लिखवाकर ले जाइये। आपके शिवाजी के साथ हमारी इतनी जानी दुश्मनी थी, वह सब हमने भुला दिया। शिवाजी के जमाई राजा इस औरंगजेब के दल में ऐशोआराम भोग रहे हैं। निंबालकर को हमने बहादुरगढ़ की थानेदारी सौंपी है। जहाँ पर हमारी जनानियों का आवास, रसद भंडार और बड़े बड़े बारूदखाने हैं—ऐसी महत्त्वपूर्ण चौकी हमने महादजी को सौंपी है। महाड़िक जेधे, माने, जगदाले जैसे अनेक नेक मराठे, अनेक गाँवों के मुखिया, बुद्धिमान ब्राह्मण सभी यहाँ पर आनन्द से जी रहे हैं। शिवा का बच्चा सम्भा ही कैसे ऐसा सिरफिरा निकला, पता नहीं। चाहे तो उस बेचारे को भी लेकर आइये। प्रेम से समझाकर और तत्काल पकड़कर यहाँ ले आइये। मुगलों की सल्तनत क्या और आपका स्वराज्य क्या ? हम सब एक हैं।'' बहादुरगढ़ से महादजी निंबालकर आये। उन्होंने बादशाह को एक सुन्दर उपहार भेंट किया। उनके बलिष्ठ शरीर, चौड़े भुजदंड, मजबूत गर्दन और तेजस्वी व्यक्तित्व देखकर औरंगजेब बहुत प्रसन्न हुआ। बड़े आदर से अपने घुटनों तक झुके महादजी के सिर को हाथ से ऊपर उठाते हुए बादशाह बोला, "महादजी आपकी तो तकदीर खुल गयी है। बहादुरगढ़ की थानेदारी करने की जगह हमने आपको रायगढ़ का सिंहासन देने का निश्चय किया है।'' "जहाँपनाह, रायगढ़ की उस पहाड़ी से आपके चरणों के पास की जमीन कहीं अधिक पवित्र है।'' "महादजी, बड़ी फौज दे रहा हूँ आपकी सहायता के लिए। शिवाजी का जमाई सेना लेकर रायगढ़ पर चढ़ाई कर रहा है, यह खबर कितनी बहादुरी की मानी जाएगी। '' महादजी ने बादशाह के पैर पकड़ लिये। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया, "ऐसी बहादुरी मुझसे नहीं हो पाएगी!'' उसने अधीरता से कहा, "हुजूर आपके पास रहते हुए ही मैं वहाँ का कार्य सम्पन्न करता हूँ।'' "वह कैसे?'' महादजी ने महाराष्ट्र के पठार के अनेक जमींदारों को पत्र लिखा था। उनकी प्रतिलिपियाँ उन्होंने बादशाह को दिखाईं। बाड़ी के खेमसावन्त को लिखा गया पत्र इस प्रकार था— "औरंगजेब बादशाह के समान बहादुर दूसरा कोई नहीं है। उन्होंने 594 :: सम्भाजी
गोलकुंडा को ध्वस्त कर दिया। बीजापुर के आदिलशाह की नाक में पानी भर दिया। अब उनकी तलवार के नीचे पापी और घमंडी सम्भाजी का भी बेड़ा गर्क होने वाला है। इसलिए इस खानदानी मराठा महादजी की शिवाजी के जामाता की आप सभी से प्रार्थना है कि आप सभी अपने औरंगजेब की सेवा में प्रस्तुत हो जायँ और अपनी सात पीढ़ियों का उद्धार करें।'' सीधे युद्ध में जाने से महादजी घबरा रहे थे। इसलिए बादशाह कुछ रुष्ट हुआ। रात को उसने असदखान से गम्भीर होकर बोला, "असदखान, पिछले अनेक वर्षों से मैं इस दक्षिण में जड़ जमाकर बैठा हूँ। मैंने मराठों को अच्छी तरह पहचाना है। वजीरे आजम बताइये, इन मराठों की कितनी जातियाँ हैं?" "जहाँपनाह! छियानबे या बानबे, ऐसा कुछ ये लोग बकते रहते हैं।" "नहीं असदखान, मेरे विचार से मराठों की सिर्फ दो ही जातियाँ हैं—एक मांडलिक मराठा, दूसरे मर्द मराठा। जिन्होंने पहले से कुतुबशाह, निजामशाह जैसा मालिक खोज लिया, उनकी सहायता से जागीर, महल संस्थान बनाकर, शानशौकत की जिन्दगी बिताते आ रहे हैं, वे मांडलिक मराठे हैं। किन्तु जो जागीर के लिए नहीं बल्कि अपने देश धर्म के लिए वर्षा धूप सहकर अपनी जिन्दगी दाव पर लगाते हैं, वे मर्द मराठे हैं। ये शिवा और सम्भा मर्द मराठों के सरताज हैं।" "जहाँपनाह, जो अपने दोस्त बने हैं उनकी तारीफ करने की जगह आप उन्हीं को दोष दे रहे हैं?" "वजीरे आजम, वे काहे के हमारे दोस्त? वे जागीर के टुकड़ों के दोस्त हैं। उनमें हमारा फायदा हो रहा है। यह अलग बात है?" "तो क्या जहाँपनाह सम्भा से दोस्ती करना चाहते हैं?" असदखान ने आँखों को सिकोड़ते हुए सीधा प्रश्न किया। "वजीरे आजम एक डेढ़ वर्ष पहले, जब गोलकुंडा का कुतुबशाह पूरी तरह हमारे कब्जे में आ गया था, उस समय उसकी और सम्भा की गुप्त दोस्ती का हमें पता था। कुतुबशाह की सहायता से मैंने सम्भा के पास दोस्ती का पैगाम भेजा था। सोचा लाखों की फौज लेकर इस बुढ़ापे में कितने वर्षों तक भटकता रहूँ?" असदखान ने अपने मन की बात भीतर ही दबाकर पूछा, "हजरत आपने सम्भा से क्या माँगा था?" "उसके सभी बड़े किले। उसके बदले में हम सम्भा को जितनी चाहिए उतनी जागीर देने वाले थे, लेकिन मैदानी भाग की।" "सम्भा ने क्या जवाब दिया?" "क्या देगा?" बादशाह का स्वर कटु हो गया, उसने कहा, "समझौते का पैगाम लेकर गये वकील के मुँह पर इतने जोर से थूका कि वकील बहुत देर तक सम्भाजी :: 595
अपनी आँख ही नहीं खोल सका।" दो दिन में ही पन्हाला से गणोजी शिर्के आये। आते ही उन्होंने बादशाह के पैर पकड़ लिए। जिस प्रकार घर के किसी बड़े बुजुर्ग के मिलने पर उसके गले लगकर कोई अपने ऊपर हुए अन्याय का दुखड़ा रोकर मन हल्का करता है। उसी प्रकार गणोजी बहुत देर तक बोलते रहे। उसके बोलते हुए बादशाह बड़ी होशियारी से उससे जानकारी प्राप्त कर रहा था। पन्हाला, विशालगढ़, मलकापुर, करहाड़, पीछे की सह्याद्रि की घाटी, जंगली रास्ते जैसी अनेक बातें पूछ रहा था। सम्भाजी और कवि कलश ने उसकी जिन्दगी किस तरह तबाह की, इसकी सारी कहानी गणोजी सुना गया। उसकी कहानी ध्यान से सुनते हुए बादशाह ने कहा, "गणोजी तुम नेक इन्सान हो, काम के आदमी हो, योग्य हो, किन्तु तुम्हारे पास कोई बड़ी फौज नहीं है।" बादशाह की इस जानकारी से गणोजी चौंक गया। किन्तु तत्काल अपने को सँभालते हुए बोला, "बादशाह सलामत, मेरे स्वामी, जैसा आप कह रहे हैं, वैसी फौजी शक्ति न होने से मैं सामने से वार नहीं कर सकता किन्तु अपने हाथ की छोटी खंजर से पीठ में ऐसा घाव करूँगा कि एकाध राज्य भी रसातल का चला जा सकता है।" "वाह गणोजी, अरे आपके जैसे नेक और बहादुर व्यक्ति को अपने जमाई के रूप में ऐसे ही थोड़े चुना होगा, शिवाजी ने।" बादशाह ने वस्त्र और आभूषण देकर गणोजी का सम्मान किया। उनके साथ दो दिन तक विचार विमर्श किया। गणोजी के विदा होते समय जितनी चाहिए उतनी जागीर देने का आश्वासन देकर बादशाह ने बल देकर कहा, "हमारे शहजादे आजम साहब से तो तुम मिले ही हो। पन्हाला की ओर आते जाते रहिये। किसी चीज की जरूरत हो तो आजम साहब से बेहिचक माँग लीजिए।" "बड़ी कृपा की आपने, बादशाह सलामत।" "आप चिन्ता न करें। आपके पन्हाला पहुँचने के पहले ही आजमसाहब के पास हमारा सन्देशा पहुँच जाएगा।"
सात
कवि कलश शम्भू महाराज को एक खुशखबरी सुनाने लगे, "समय पर भगवान की 596 :: सम्भाजी
कृपा हुई है, राजन! जिंजी से बड़ी अच्छी खबर आयी है। " "कौन सी कविराज ?" "हरजी राजा ने तीन हजार बैलों पर लादकर धन और अनाज भेजा है। पन्द्रह दिन पहले ही लोग वहाँ से बैलों को लेकर चल चुके हैं।" "अच्छा हुआ।" महाराज प्रसन्न हो गये। बड़े सन्तोष के साथ उन्होंने कहा, "हरजी शूरवीर और होशियार हैं। यहाँ की अकाल और अभाव की खबरों को सुनकर उनकी आँखें खुल गयी होंगी। कुछ भी हो जो हुआ अच्छा ही हुआ। दो चार दिन ही बीते थे कि कृष्णाजी कोन्हेरे कवि कलश और शम्भूजी महाराज के पास दौड़ते हुए आये। अपने कन्धे के उत्तरीय को झटकते हुए कहने लगे, "पत्र आया है, अथणी से, दिगोजी निंबालकर की खबर कुछ अच्छी नहीं है।" शम्भू महाराज और कवि कलश ने आँखें उठाकर कोन्हेरे की ओर देखा। कोन्हेरे ने कहा, "जिंजी से पीठ पर धनधान्य लादे बैल जत के मैदान में पहुँच गये। वहाँ बादशाह की फौज ने उन्हें लूट लिया। परन्तु दिगोजी पन्त का कहना है कि सम्भव है कि बैलों को हाँकने वाले रास्ता भूलकर बादशाह की फौज में पहुँच गये होंगे।" शम्भू महाराज ने इस पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। दो दिन बाद ही हरजी राजा का पत्र आया। उन्होंने लिखा था, "अनाज पहुँचा या नहीं कृपया इसी हरकारे से शीघ्रातिशीघ्र सूचित करें। कवि कलश ने आश्चर्य से पूछा, "राजन गलती किससे हुई? आदमियों से या बैलों से ?" उदास भाव से हँसते हुए शम्भू महाराज ने कहा, "कविराज तीन हजार बैलों को हाँकने वाले कितने रहे होंगे ?" "कम से कम साठ सत्तर।" "हरजी के ही न ?" "नहीं तो और किसके ?" "फिर उसका दोष उन चौपाए जानवरों को क्या दिया जाय ? दो पैर वाले के दिमाग से निकली यह कोई योजना है।" "मतलब ?" "मैं पहले से ही कहता आया हूँ कि हमारे हरजी 'जीजा जितने बहादुर हैं, उतने ही चालाक भी। यह योजना तो उनकी पहले से बनी बनाई है।" "वह कैसे ?" "हमें रसद भेजने की सूचना देकर उसी समय रसद जानबूझकर औरंगजेब के पास भेज दी गयी। भविष्य में अगर हमारे दुर्भाग्य से बादशाह की विजय हुई तो सम्भाजी :: 597
उनके पास दंडवत होने के लिए ये तैयार रहेंगे। यह भी कहेंगे कि हम तो पहले से ही बादशाह के सेवक रहे हैं। कोई और रास्ता न होने के कारण साले के पास रुके थे। वफादारी का सबूत पेश करने के लिए ये बैल उपयोगी सिद्ध होंगे।" आठ सवेरे सवेरे जुल्फिकार आकर बादशाह के सामने खड़ा हो गया तो बादशाह ने उसके चेहरे की ओर देखा। औरंगजेब का कलेजा काँप गया था। उसके मौसेरे भाई का चेहरा इतना ठगा सा हो गया था कि आगे कुछ पूछने की बादशाह की हिम्मत ही नहीं हो रही थी। करुण एवं उदास स्वर में जुल्फिकार किसी प्रकार बोला, "रहम करें जहाँपनाह! यह बुरी खबर देने के लिए मेरी जबान उठ ही नहीं रही है। हमारे जैनुद्दीन और उसके साथियों ने बड़ी कोशिश की थी। पाचाड़ के राजमन्दिर में राजाराम ने उन्हें खाने पर बुलाया था। उसी रात को उसे गिरफ्तार करना था। किन्तु उसी समय सम्भाजी की पत्नी येसूबाई वहाँ पहुँच गयी। उसने हमारे बहादुरों की आँखों में नाचती चोर दृष्टि को तत्काल पहचान लिया। 'दुश्मन, दुश्मन' कहकर ऐसा शोर मचाया कि मराठे सैनिक दौड़ पड़े। फिर क्या था, मराठों ने हमारे सारे साथियों को काट डाला। बचे हुए दो को कैद कर लिया गया है।" बादशाह ने कुछ भी कहा नहीं। खिन्न मन से लालबारी के दरबार वाले डेरे में जाकर बैठ गया। चुपचाप नित्य की भाँति अपना कार्य शुरू किया। उसी दिन दोपहर को मंसूरखान की एक हजार सवारों की एक फौज, दौड़ते हुए जत के मैदान में आयी। सेना अपने साथ कुछ कैदियों को भी लेकर आयी थी। औरंगजेब ने तुरन्त उन्हें भीतर बुलाया। बादशाह के सामने गोसांई की वेश भूषा में आठ हट्टे कट्टे नौजवान आँखें लाल किये निर्भीक भाव से खड़े थे। उनके काले कठोर चेहरे और उनकी लाल आँखों को देखने का साहस नहीं हो रहा था। "मंसूरखान! कौन हैं ये लोग?" "जहाँपनाह! कल ही हिन्दुओं के एक शिवमन्दिर में मिल गये। ये बदमाश सम्भा के आदमी हैं।" "आठ?" "नहीं हजरत! चार पाँच और भी थे। हमारे सूबेदार ने रात को धावा बोला तो ५७४ सम्भाजी
अँधेरे का फायदा उठाकर चार-पाँच भाग गये। इनका लिबास गोसाइयों और फकीरों का है, मगर ये पेशे से फौजी हैं। एक एक के शरीर में दस दस आदमी की ताकत है।‘‘ बादशाह ने अपनी जप माला को सीने मे लगाते हुए पूछा, ‘‘और इन लोगों का मकसद?’’ मंसूरखान हड़बड़ा गया। वह अन्य उपस्थित लोगों की ओर देखने लगा। तब बादशाह ने सभी को बाहर जाने के लिए आँखों मे संकेत किया। गुप्तचर, नौकर, मेहमान सभी बाहर चले गये। उन आठ लोगों पर औरंगजेब ने एक बारीक नजर डाली और तुरन्त मंसूरखान से पूछा, ‘‘इन लोगों का मकसद?’’ ‘‘आपकी मौत। जहाँपनाह।‘‘ ऐसा कहते हुए खान ने अपना सिर नीचे झुका लिया। मंसूरखान ने मराठों की इस टोली को पहले ही बहुत पीटा था। उनके शरीर पर अनेक घाव दिख रहे थे। किन्तु उनकी आँखों में तेज था। उनके बारे में बादशाह ने खास पूछताछ की-‘’मंसूरखान फौज में इनका ओहदा क्या था? सरदार सूबेदार?’’ ‘‘नहीं हुजूर, साधारण सैनिक। किन्तु इनके पद की अपेक्षा इनका मकसद बहुत ही खतरनाक था। आपको बीच ही में कहीं पर फँसाकर कत्ल कर देने का इनका इरादा था। इसीलिए ये यहाँ आये थे।‘‘ औरंगजेब ने सकट के एक और विषैले घूँट को पी लिया। अपने पर काबू करते हुए, उसने एक फौजी संन्यासी से प्रश्न किया, ‘‘क्यों जवाँमर्द सम्भा ने तुम्हें क्या हुक्म दिया था?’’ बिना एक क्षण का विलम्ब किये वह तरुण बोला, ‘‘महाराज ने हमसे इतना ही कहा था। औरंगजेब हमारे देश, धर्म और ईश्वर के लिए सकट हैं। वह जहाँ भी और जिस रूप में मिले उसे वहीं और उसी रूप मे खत्म कर दो।‘‘ औरंगजेब मन्द हँसी हँसकर मंसूरखान से पूछने लगा, ‘‘अथणी के देवालय मे सम्भा के दूसरे साथी भाग गये थे क्या?’’ ‘‘नहीं नहीं जहाँपनाह! इतना ही नहीं है।‘‘ खाँसते और गला साफ करते हुए मंसूर ने कहा, ‘‘अपनी जान की बाजी लगाकर आपका खात्मा करने के लिए ऐसी दस बारह टोलियाँ, जत, अथणी, पंढरपुर, मंगलवेढ़ा आदि क्षेत्रों में घूम रही हैं।‘‘ मंसूरखान का आखिरी वाक्य तपती सलाख की तरह घूम गया। प्रयत्न करने पर भी वह अपने चेहरे की भीति रेखा को छुपा नहीं पाया। वह सन्तप्त होकर बोला, ‘‘जिस समय वह बदमाश हंबीरराव मरा, उस समय लगा था कि सम्भा झुक
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जाएगा। जब काफिरों की सहायता करने वाली कुतुबशाही और आदिलशाही का खात्मा किया था, तभी भी ऐसा ही लगा था। लेकिन—लेकिन—" बादशाह की बात अधूरी ही रह गयी। उस दिन बादशाह ने अपना लालबारी का दरबार जल्दी ही समाप्त कर दिया। संकटों के आघात को मनुष्य झेल सकता है, किन्तु जब समय ही आघात करने लगे तो मनुष्य का अपने ऊपर से विश्वास उठने लगता है। बीजापुर की महामारी झेलकर और अपनी पचहत्तर हजार सेना गँवाकर भी बादशाह बड़े उत्साह और हिम्मत से आगे बढ़ा था। किन्तु उसका नसीब ही धोखा दे रहा था। पन्हाला की ओर से शहजादे आजम से कोई समाचार नहीं मिल रहा था। मराठों ने सर्जाखान, शहाबुद्दीन, पोलादखान, बरामदखान जैसे बहादुरों को वहीं उलझा रखा था। उसी में राजाराम को पकड़ने की खतरनाक कोशिश भी नाकाम हो गयी थी। धन का अभाव, रसद का अभाव, उत्तर से सहायता का निरन्तर कम होते जाना, दक्खिन में जगह-जगह अकाल, अन्तिम सफलता न मिलने से हताश होती फौज, उद्धत होते सवार-सरदार, मनोबल और धीरज खो चुकी फौज और ऊपर से वह कौड़ी कबरी का खेल!'' बादशाह के दिमाग में किसी ने कौड़ी-कबरी का जालिम खेल भर दिया था। उससे भी अधिक मंसूरखान द्वारा ले आये गये अथणी के वे कैदी उसे आतंकित कर रहे थे। सम्भा द्वारा इधर भेजी गयी टोलियाँ और उनके द्वारा कही गयी वह हकीकत। लगता है वह काफिर का बच्चा अपनी गर्दन पर बैठा है। बादशाह सारी रात छटपटाता रहा। डेरे की कनात के पास हवा से यदि कोई पत्ता खड़का या घोड़े के पाँव से हल्की-सी आवाज हुई तो बादशाह घबराकर उठ जाता था। किस नदी के किनारे अपनी कब्र बनाई जाएगी? मेरी जान लेने के सम्भा के द्वारा भेजे गये शैतान यहाँ कैसे आ पाएँगे? इसी प्रकार की शंकाओं ने बादशाह को पागल बना दिया था। आँखों के सामने हीराबाई, पानी के बिन तड़पता शाहजहान, रक्त से सना दारा का सिर नाच रहा था। दक्खिन का सह्याद्रि छाती पर टूटता हुआ सा प्रतीत हो रहा था। बड़े सवेरे ही बादशाह को तेज बुखार चढ़ा। उदयपुरी बेगम उसका सिर पकड़कर पास ही बैठी थी। किसी भी उपाय से बुखार उतर नहीं रहा था। किन्तु हकीम ने बताया था कि वह प्लेग का बुखार नहीं है। यह जानकर सभी की जान में जान आयी। बुखार से तड़पते बादशाह के कानों में किसी की आवाज आयी। "मुकर्रबखान उस ओर सांगोला के समीप आया है।" बादशाह ने तुरन्त उसके पास हरकारा भेजा। दूसरे दिन दुर्बल बादशाह अपने बिस्तर में पड़ा था। कनात की खिड़कियों से 600 :: सम्भाजी
डूबते सूर्य की किरणें भीतर आने की कोशिश कर रही थीं। बादशाह ने नजर उठाई तो उसे पलँग के पास मुकर्रबखान हैदराबादी दिखाई पड़ा। उसके हाथ में फलों की टोकरी थी। अपने बीमार स्वामी से मिलने के लिए वह दौड़ता हुआ आया था। बादशाह ने इशारे से अपने सिरहाने बिठा लिया। मुकर्रबखान ने चिन्तित स्वर में पूछा, "मेरे आका शाही हकीम आकर गया कि नहीं?" बादशाह ने अपने कोमल हाथ के पंजे से मुकर्रबखान का हाथ पकड़ लिया। बड़े प्रेम से हाथ को दबाते हुए बादशाह ने भावुक होकर कहा, "मुकर्रबऽ तू ही मेरा सच्चा हकीम है।" मुकर्रबखान को देखते-देखते औरंगजेब की डूबती आँखों में जान आ गयी। उसने उसकी ओर घूरकर देखा। बबूल के तने जैसा ऊँचे साँवले चमकती आँखों वाले तेजस्वी मुकर्रबखान को देखकर बादशाह का साहस और भी बढ़ गया। जैसे कोई व्यक्ति पुराने कपड़ों को छोड़कर नये कपड़े धारण कर लेता है, वैसे ही बादशाह ने अपनी बीमारी को छोड़कर नया जोश धारण कर लिया। बादशाह उठकर बिस्तर में बैठ गया। मुकर्रबखान की हथेली को बड़े प्यार से सहलाते हुए उसने कहा, "मुझे पता है मुकर्रबखान कि," कहते-कहते बादशाह की दृष्टि पास बैठी उदयपुरी बेगम पर पड़ी। राजनीति की बात चलने पर बेगम ही नहीं, अन्य किसी को भी वहाँ रुकने की इजाज़त नहीं थी। उदयपुरी बेचारी तुरन्त वहाँ से दूसरी ओर चली गयी। "हाँ, हाँ। मुझे पता है मुकर्रबखान! दक्खिन के सभी मुसलमान सरदारों में एक तू ही केवल बहादुर योद्धा ही नहीं अल्लाह के दरबार का सच्चा सिपाही भी है।" "मैं तो आपका एक साधारण सेवक हूँ, बादशाह सलामत।" अब मुकर्रब खूब सावधान हो गया था। बादशाह ने किस उद्देश्य से इतनी शीघ्रता से उसे मिलने के लिए बुलाया था, यह उसकी समझ में नहीं आया था। किन्तु उसे बहुत देर तक भ्रम में न रखकर औरंगजेब ने कहा, "शेख मुकर्रब! उस नारकी सम्भा ने कितना उपद्रव मचा रखा है, यह आपको बताने की जरूरत नहीं है। वह कैसा कुत्ता और कमीना है यह भी आप जानते हैं। इस काफिर बच्चे के बाप शिवा को भी मैंने पुरन्दर की सन्धि के समय काबू में कर लिया था। किन्तु आज नौ-दस वर्षों से यह शैतान औरंगजेब को मूर्ख फकीरों की तरह दक्षिण के वनों और मैदानों में भटका रहा है।" बादशाह ने मुक्त मन से साँस ली। बोलते बोलते वह बहुत भावुक हो गया। उसकी आँखों में आँसू उमड़ आये। गाजर की भाँति बादशाह की लाल नाक और भी लाल दिखने लगी। उसने व्याकुलता से कहा, "मुकर्रब! किस बुरे मुहूर्त में मैं इस मुहिम पर निकला? कौन जाने। मराठों के महत्त्वपूर्ण किले अभी भी क़ब्जे में सम्भाजी :: 601
नहीं आये। सम्भा का कुछ पता नहीं चलता। मेरे सभी शहजादे मूर्ख हैं। पोते भी बेवकूफ निकले। फौज का मनोबल भी टूट चुका है। मेरी उम्र हो गयी है। उठते- बैठते हड्डियाँ बजती हैं। अल्लाह की सेवा में टोपियाँ बनाने के लिए भी नजर काम नहीं देती। अपनी सेना पर भी अब मुझे भरोसा नहीं है। सह्याद्रि की घाटियों का स्मरण करके ही सैनिक घबरा जाते हैं। वे हरामजादे कबड्डी-कबरी का खेल खेलते हैं। वे यह अन्दाज लगाने की भी कोशिश करते हैं कि बादशाह की कब्र दक्षिण में किस नदी के किनारे बनाई जाएगी।" "जहाँपनाह। लानत है ऐसी जिन्दगी पर।" मुकर्रब बीच में ही बोल पड़ा, "चार-पाँच लाख फौज के मालिक और हिन्दुस्तान के शहंशाह, जिसके आसपास सैनिकों का समुद्र, ऐसे बादशाह की आँखों में आँसू? फिर ऐसी फौज किस काम की?" "इसीलिए तो हम तुम्हें पन्हाला की ओर भेज रहे हैं।" "आप सारी फिक्र छोड़ दें जहाँपनाह। अब मैं खुले मैदान में उस सम्भा की चमड़ी उधेड़ता हूँ। नहीं तो उस जंगली बन्दर को नचाते हुए आपके पास ले आता हूँ।" "ऐसा शैतानी ख्वाब कभी मत देखना मुकर्रबखान! अरे बेवकूफ वह सम्भा खुली जंग में बन्दी होने वाला होता तो यह बादशाह पिछले आठ नौ वर्षों तक फकीरों की तरह क्यों भटकता? आज मेरे सभी सरदार और तीन साढ़े तीन लाख की फौज नाकामयाब है और सह्याद्रि की पहाड़ियों में राज्य करने वाला वह शिवा का कुत्ता दिन-ब-दिन मगरूर होता जा रहा है।" बादशाह खयालों में खो गया। उसने अपने आपसे कहा, 'यह सच है कि सह्याद्रि की उन पहाड़ियों पर मेरा भरोसा कभी नहीं रहा। आज तो खुद पर भी मेरा भरोसा नहीं है। इस फौजी जुलूस पर तो बिलकुल नहीं। अरे रामशेज जैसे छोटे से किले पर कब्जा करने के लिए हमारे इन हरामजादों को साढ़े छह वर्ष हो रहे हैं। तो इनका भरोसा कैसे किया जाय? रामशेज तो नाशिक के पास है जबकि गयगढ, राजगढ़, प्रतापगढ़ तो सह्याद्रि के हृदय में बसे हुए हैं।' "तो क्या हुआ जहाँपनाह? हम जाएँगे। चलिए मैं आपके साथ हूँ।" "हम किसलिए जाएँगे? अपनी कब्र की जगह खोजने के लिए?" बादशाह कुछ हताश हुआ। किन्तु फिर ममझाने के स्वर में बोला, "मुकर्रब तू मुझे अपने सगे भाइयों से भी अधिक प्रिय है। इसलिए बताता हूँ। मुझे एक शैतानी ख्वाब रात दिन आना रहता है कि उस रायगढ़ और राजगढ़ किले पर सिंह का एक घायल बच्चा निरन्तर गश्त लगा रहा है। यह घूमता हुआ सिंहशावक मुझे रात-दिन सता रहा है। 602 सम्भाजी