छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबादशाह बहुत टूट गया था। महीने-डेढ़ महीने में सत्तर हजार फौज समाप्त हो चुकी थी। दुखी औरंगजेब ने आकाश की ओर देखा। गहरी साँस लेते हुए उसने कहा, "उदयपुरीऽ इतनी बड़ी लड़ाइयाँ हमने जीतीं। गोलकुंडा के उस मूर्ख तानाशाह को एक बार नहीं दो बार पराजित किया। वहाँ खाई में आधे हैदराबाद को गाड़ दिया। बीजापुर की अभिमानी तटबन्दी को ध्वस्त कर दिया। वहाँ का खजाना हासिल किया। कुतुबशाह और आदिलशाह दोनों गीदड़ के बच्चे की तरह आज हमारी कैद में पड़े हैं। किन्तु इस आसमान जैसी बड़ी विजय का फायदा क्या?" "हजरत आप अधिक बात न करें। आराम करें—" उदयपुरी बेगम ने हाथ जोड़कर कहा। "बेगम, आज दो बड़ी सल्तनतों की मिली विजय पर हँसें या प्लेग द्वारा कमर तोड़ दिये जाने पर रोयें?" बादशाह को किसी तरह समझाया गया। किन्तु उसी समय जुल्फिकारखान वहाँ आ गया। उसने रोज की तरह मरने वालों की संख्या का आँकड़ा प्रस्तुत किया। "किब्लाए आलम आज केवल दो हजार।" "लड़ाई के मैदान में दो हजार सिपाही बिना लड़े मर जायें तो यह कोई मामूली संख्या नहीं होती, बेवकूफ नौजवान!" बादशाह ने क्रोधावेश में कहा, "जुल्फिकारखान तुम अपने परवरदिगार से पूछो कि हमारी छावनी में हजारों सैनिक मक्खियों की तरह मर रहे हैं फिर वहाँ उस जहन्नमी सम्भा को मौत क्यों नहीं आती?" कमजोरं और बीमारी से जर्जर फौज को लेकर आगे बढ़ना सम्भव नहीं था। प्लेग मानो सम्पूर्ण मानवजाति को समाप्त करने के लिए ही आया था। लोगों को दो तीन दिन तक ज्वर आता था। उससे कुछ भाग्यशाली बच भी जाते थे। किन्तु काँख की गाँठ के साथ सारे शरीर में फैलने वाला विचित्र बुखार सचमुच जानलेवा था। जो भाग्य से बच गया तो भी उसके शरीर की सारी शक्ति निकल जाती थी। वह व्यक्ति इतना क्षीण और शक्तिहीन हो जाता था कि वह चलती-फिरती लाश बन जाता था। मैदान में हजारों लोग कराहते हुए पड़े थे। इस विचित्र अवस्था ने बादशाह को पागल बना दिया था। किन्तु बादशाह इस बात को क्षणमात्र के लिए भी नहीं भूला था कि इस अवस्था से बाहर निकलकर सबसे बड़े तीसरे शत्रु को विनष्ट करना है। इसलिए अपने कार्यव्यापार और पत्राचार से उसका ध्यान जरा भी नहीं हटता था। असदखान डेरे में बीमार होकर पड़ा था। उसका काम जुल्फिकार सँभाल रहा था। अपने मौसेरे भाई को सामने बैठने का संकेत करते हुए औरंगजेब ने कहा, 586 :: सम्भाजी