छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंही नहीं किया था। फौज के कुछ फिरंगी तोपची इस रोग को प्लेग कहते थे। लालबारी के पास का आकाश दीप भी रोग के साथ ही अन्धे की भाँति टिमटिमाता हुआ रातभर इधर-उधर देखता रहता था। बादशाह को भी थोड़ा ज्वर आ गया जिससे सभी परेशान हो गये। अब तक करीब सत्तर हजार मुगल सैनिक इस रोग की-चपेट में आ गये थे। हवा में चारों ओर दुर्गन्ध फैल गयी। सैनिकों के कराहने की आवाज इतनी बढ़ गयी कि वहाँ रहना कठिन हो गया। मृत्यु का भय या उसकी भयानकता का अनुभव अब किसी को होता ही नहीं था। लोग इतने भावनाशून्य हो गये थे कि मृत्यु पर भी कोई शोक नहीं करता था। किया भी तो कौन किसकी सुनता? प्रत्येक तम्बू में खुली जगह में, तम्बुओं की आड़ में सभी जगह दुर्गन्ध फैल गयी थी। मृत्यु की काली छाया सभी ओर पहुँच गयी थी। चार-छह दिनों में ही पूरा क्षेत्र एक बड़े कब्रिस्तान में बदल गया था। मृत्यु की छाया एक पागल बन्दर की तरह औरंगजेब के पीछे पड़ी थी। बादशाह के दो पोतों की मृत्यु हो गयी। असदखान भी प्लेग के बुखार में तड़पते हुए अपने डेरे में पड़ा था। बादशाह ने एक महीने में चार बार अपनी जगह बदली थी। पिछले सप्ताह से औरंगजेब बहुत बेचैन हो गया था। एक ओर मैदान में हजारों लाशें पड़ी थीं और दूसरी ओर लाशों को खाने वाले गीदड़ और कुत्ते भी वहाँ फटक नहीं रहे थे। इस शैतानी बीमारी का कोई इलाज भी नहीं था। अपने मन को सान्त्वना देने के लिए लोग हकीम से किसी वनौषधि का पत्ता माँगकर ले जाते थे। उसे चूसते हुए ठनकती गाँठों को काँख या जाँघ में दबाकर सो जाते थे। दो-चार दिन में मौत आ जाती थी। तम्बू में यदि कोई समीपी व्यक्ति हुआ तो शव को खींचकर ले जाता था। कब्र के नाम पर कहीं पर सिर्फ मिट्टी ढक देता था। किन्तु दफनाने के लिए भी जगह नहीं मिल रही थी। मुर्दों को खींचकर ले जाने के लिए भी कोई नहीं मिलता था। मुर्दा ढोने वाले भी मुर्दा ढोते-ढोते महामारी से ग्रस्त होकर मर रहे थे। भिश्ती समाप्त हो चुके थे। बादशाह अपने शाही डेरे की कनात की खिड़की से दूर देख रहा था। महामारी से टूटा हुआ बीजापुर साफ दिखाई पड़ रहा था। उस नगर के सामर्थ्य और अभिमान का प्रतीक गोलगुम्बद भी काला पड़ गया था। औरंगजेब को बहुत सूनेपन और अकेलेपन का अनुभव हो रहा था। उसकी दोनों प्यारी बेगमें उदयपुरी और औरंगाबादी घबराकर उसके सिरहाने बैठी थीं। बादशाह को बुखार आ गया था। किन्तु महामारी की गाँठ बादशाह को न आये इसके लिए अल्लाह से दुआ माँग रही थीं। सम्भाजी :: 585