छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 592, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंसे वजीर असदखान उसकी चपेट से बच गया। किन्तु फिरोजजंग हमेशा के लिए अन्धा हो गया। किसी को अन्धा, किसी को बहरा करके और हजारों को सदा के लिए अपने साथ लेकर महामारी चली गयी। बादशाह के पास प्रतिदिन नये समाचार आ रहे थे। सम्भाजी भी अकाल की बाधा से बाहर निकल रहे थे। किन्तु उनके खंडो बल्लाल, निलोपन्त पेशवा, केसो त्रिमल और सेनापति म्हालोजी घौड़पड़े के कार्यों में गति नहीं आ रही थी। मराठों ने सावधानी और आक्रामक तरीके से सर्जाखान को कब्जे में कर रखा था। ऐसे संकेत मिल रहे थे कि सम्भाजी बादशाह के विरुद्ध कोई बड़ी योजना बना रहे हैं। सम्भाजी की आक्रामकता से बूढ़े बादशाह में नया जोश आ गया। 14 सितम्बर, 1688 के दिन कूच के नगाड़े बज गये। लाखों जानवरों और मनुष्यों के साथ औरंगजेब, नयी आशा से महाराष्ट्र के पठार की ओर बढ़ने लगा। छह जत के मैदान में बादशाह का डेरा पड़ा था। लगभग बीस मील तक शाही फौज के डेरे-डंडे फैले थे। मध्यभाग में बादशाह का लालरंग का तम्बू अधिक मटमैला दिख रहा था। लम्बी यात्रा के कारण ऊँट हड़बड़ा गये थे, घोड़े शिथिल पड़ गये थे। भरपूर पानी न मिलने के कारण हाथी भी त्रस्त दिखाई पड़ रहे थे। दो सौ से अधिक फौजी बाजार सूने-सूने लग रहे थे। शाही फौज का पहले वाला उत्साह, जोश, शान आदि कुछ भी शेष नहीं था। जैसे किसी सुन्दर पुरुष की कान्ति पर चेचक के दाग पड़ गये हों और बुढ़ापे के कारण उसका चेहरा सूख गया हो, उसी तरह शाही फौज का सारा उत्साह सूख चुका था। प्रतिदिन की तरह सवेरे अपना नियमित नमाज अदा करके, कपड़े पहनकर, बादशाह शिविर के दरबार की ओर जाने के लिए निकला। उसी समय उदयपुरी बेगम वहाँ पर आ गयीं। उन्होंने बादशाह के उड़ते बालों को 'हाथ से सँवारते हुए कहा, "हजरत, आज आपने आईना नहीं देखा क्या?" इन शब्दों को सुनते ही औरंगजेब ने उदयपुरी के हाथ को झटककर पीछे कर दिया। उसके इस रूप को देखकर उदयपुरी बेगम घबरा गयीं। वह हाथ जोड़कर थरथर काँप रही थीं। तब बादशाह क्रोध में ही गुर्राया, "बेगम साहिबाऽ आप कैसा 590 :: सम्भाजी