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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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सवाल कर रही हैं? पिछले पाँच वर्षों में इस आलमगीर ने कभी आईना देखा? ऐसा कोई दिन याद है आपको?'' ''हजरत क्षमा करें।'' ''बेगम साहिबा, कैसे और किस मुख से आईने मे अपना चेहरा देखूँ?'' विफलता के विषाद से तडपते हुए बादशाह ने कहा, ''आज सारी दुनिया में शायद ही किसी के पास मेरी जितनी बड़ी हुकूमत हो। फिर भी यह शहंशाह बिना राजमुकुट के पिछले पाँच वर्षों से दक्खिन की इस नादान धरती पर दर दर भटक रहा है। कैसा शहंशाह और कैसी सल्तनत? राज्य होने पर भी सिर पर मुकुट पहनने का अवसर नहीं। तो भी बेशर्म की तरह आईने में अपना मुँह देखना चाहिए?'' ''मेरे आका मुझे माफ कर दो ऐसी गलती आगे नहीं होगी।'' बादशाह ने स्वयं को सँभाल लिया। वह उदास भाव से कुछ धीमे स्वर में बोला, ''बेगम साहिबा, आईने में देखते हुए काफिर हिन्दुओं की स्त्रियाँ जब अपने माथे पर कुंकुम नहीं देखतीं और अनुभव करती हैं कि उनका पति जिन्दा नहीं है तो उन्हें अत्यन्त दुख होता है। मेरी स्थिति भी उन्हीं काफिर स्त्रियों जैसी हो गयी है। बिना मुकुट के अपने सिर को देखते हुए मुझे भी बड़ी ग्लानि होती है।'' खिन्न बादशाह धीरे धीरे चलते हुए, बैठक में आकर बैठ गया। असदखान ने महामारी से अपनी आँखों को किसी प्रकार बचा लिया था। किन्तु आज वह बहुत नाराज दिखाई पड़ रहा था। मेंहदी लगी अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए और असदखान पर नजरें टिकाए, बादशाह ने कहा, ''वजीरे आजम आप साफ-साफ क्यो नहीं कहते कि उस काफिर सम्भा से आज भी हमारी फौज घबराती है।'' ''जी हाँ जहाँपनाह, सभी घबराते हैं उस सम्भा से और वह जिस पहाड़ी पर रहता है उस सह्याद्रि पर्वत से।'' आप भी तो आजकल फौज की सारी खबरें मुझ तक कहाँ पहुँचाते हो, वजीरे आजम? ऐसा कैसे होगा जहाँपनाह? आपको कुछ गलतफहमी-'' ''फिर बताइये-ये क्या है-कबड़ी और कबरी?'' अब तो वजीर की जबान रुक गयी। उसे इस बात का आश्चर्य हुआ कि इतनी छोटी छोटी बाते भी बादशाह के कान तक पहुँचती हैं। उसे स्वप्न में भी इसकी कल्पना नहीं थी। वजीर पर अपनी कड़ी नजर डालते हुए बादशाह ने कड़े स्वर में पूछा, ''क्या है यह कबड़ी और कबरी?'' वजीर का चेहरा ऐसा हो गया जैसे भट्ठी मे तपता हुआ कोई हथियार पकड़ लिया हो। घबराकर वजीर बताने लगा, ''जहाँपनाह हमारे फौजी विश्राम के समय में एक खेल खेलते हैं। हाथ की छड़ी से धूल में छोटे-छोटे गोले बनाते हैं। हर सम्भाजी 591