छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 603, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंडूबते सूर्य की किरणें भीतर आने की कोशिश कर रही थीं। बादशाह ने नजर उठाई तो उसे पलँग के पास मुकर्रबखान हैदराबादी दिखाई पड़ा। उसके हाथ में फलों की टोकरी थी। अपने बीमार स्वामी से मिलने के लिए वह दौड़ता हुआ आया था। बादशाह ने इशारे से अपने सिरहाने बिठा लिया। मुकर्रबखान ने चिन्तित स्वर में पूछा, "मेरे आका शाही हकीम आकर गया कि नहीं?" बादशाह ने अपने कोमल हाथ के पंजे से मुकर्रबखान का हाथ पकड़ लिया। बड़े प्रेम से हाथ को दबाते हुए बादशाह ने भावुक होकर कहा, "मुकर्रबऽ तू ही मेरा सच्चा हकीम है।" मुकर्रबखान को देखते-देखते औरंगजेब की डूबती आँखों में जान आ गयी। उसने उसकी ओर घूरकर देखा। बबूल के तने जैसा ऊँचे साँवले चमकती आँखों वाले तेजस्वी मुकर्रबखान को देखकर बादशाह का साहस और भी बढ़ गया। जैसे कोई व्यक्ति पुराने कपड़ों को छोड़कर नये कपड़े धारण कर लेता है, वैसे ही बादशाह ने अपनी बीमारी को छोड़कर नया जोश धारण कर लिया। बादशाह उठकर बिस्तर में बैठ गया। मुकर्रबखान की हथेली को बड़े प्यार से सहलाते हुए उसने कहा, "मुझे पता है मुकर्रबखान कि," कहते-कहते बादशाह की दृष्टि पास बैठी उदयपुरी बेगम पर पड़ी। राजनीति की बात चलने पर बेगम ही नहीं, अन्य किसी को भी वहाँ रुकने की इजाज़त नहीं थी। उदयपुरी बेचारी तुरन्त वहाँ से दूसरी ओर चली गयी। "हाँ, हाँ। मुझे पता है मुकर्रबखान! दक्खिन के सभी मुसलमान सरदारों में एक तू ही केवल बहादुर योद्धा ही नहीं अल्लाह के दरबार का सच्चा सिपाही भी है।" "मैं तो आपका एक साधारण सेवक हूँ, बादशाह सलामत।" अब मुकर्रब खूब सावधान हो गया था। बादशाह ने किस उद्देश्य से इतनी शीघ्रता से उसे मिलने के लिए बुलाया था, यह उसकी समझ में नहीं आया था। किन्तु उसे बहुत देर तक भ्रम में न रखकर औरंगजेब ने कहा, "शेख मुकर्रब! उस नारकी सम्भा ने कितना उपद्रव मचा रखा है, यह आपको बताने की जरूरत नहीं है। वह कैसा कुत्ता और कमीना है यह भी आप जानते हैं। इस काफिर बच्चे के बाप शिवा को भी मैंने पुरन्दर की सन्धि के समय काबू में कर लिया था। किन्तु आज नौ-दस वर्षों से यह शैतान औरंगजेब को मूर्ख फकीरों की तरह दक्षिण के वनों और मैदानों में भटका रहा है।" बादशाह ने मुक्त मन से साँस ली। बोलते बोलते वह बहुत भावुक हो गया। उसकी आँखों में आँसू उमड़ आये। गाजर की भाँति बादशाह की लाल नाक और भी लाल दिखने लगी। उसने व्याकुलता से कहा, "मुकर्रब! किस बुरे मुहूर्त में मैं इस मुहिम पर निकला? कौन जाने। मराठों के महत्त्वपूर्ण किले अभी भी क़ब्जे में सम्भाजी :: 601