छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनहीं आये। सम्भा का कुछ पता नहीं चलता। मेरे सभी शहजादे मूर्ख हैं। पोते भी बेवकूफ निकले। फौज का मनोबल भी टूट चुका है। मेरी उम्र हो गयी है। उठते- बैठते हड्डियाँ बजती हैं। अल्लाह की सेवा में टोपियाँ बनाने के लिए भी नजर काम नहीं देती। अपनी सेना पर भी अब मुझे भरोसा नहीं है। सह्याद्रि की घाटियों का स्मरण करके ही सैनिक घबरा जाते हैं। वे हरामजादे कबड्डी-कबरी का खेल खेलते हैं। वे यह अन्दाज लगाने की भी कोशिश करते हैं कि बादशाह की कब्र दक्षिण में किस नदी के किनारे बनाई जाएगी।" "जहाँपनाह। लानत है ऐसी जिन्दगी पर।" मुकर्रब बीच में ही बोल पड़ा, "चार-पाँच लाख फौज के मालिक और हिन्दुस्तान के शहंशाह, जिसके आसपास सैनिकों का समुद्र, ऐसे बादशाह की आँखों में आँसू? फिर ऐसी फौज किस काम की?" "इसीलिए तो हम तुम्हें पन्हाला की ओर भेज रहे हैं।" "आप सारी फिक्र छोड़ दें जहाँपनाह। अब मैं खुले मैदान में उस सम्भा की चमड़ी उधेड़ता हूँ। नहीं तो उस जंगली बन्दर को नचाते हुए आपके पास ले आता हूँ।" "ऐसा शैतानी ख्वाब कभी मत देखना मुकर्रबखान! अरे बेवकूफ वह सम्भा खुली जंग में बन्दी होने वाला होता तो यह बादशाह पिछले आठ नौ वर्षों तक फकीरों की तरह क्यों भटकता? आज मेरे सभी सरदार और तीन साढ़े तीन लाख की फौज नाकामयाब है और सह्याद्रि की पहाड़ियों में राज्य करने वाला वह शिवा का कुत्ता दिन-ब-दिन मगरूर होता जा रहा है।" बादशाह खयालों में खो गया। उसने अपने आपसे कहा, 'यह सच है कि सह्याद्रि की उन पहाड़ियों पर मेरा भरोसा कभी नहीं रहा। आज तो खुद पर भी मेरा भरोसा नहीं है। इस फौजी जुलूस पर तो बिलकुल नहीं। अरे रामशेज जैसे छोटे से किले पर कब्जा करने के लिए हमारे इन हरामजादों को साढ़े छह वर्ष हो रहे हैं। तो इनका भरोसा कैसे किया जाय? रामशेज तो नाशिक के पास है जबकि गयगढ, राजगढ़, प्रतापगढ़ तो सह्याद्रि के हृदय में बसे हुए हैं।' "तो क्या हुआ जहाँपनाह? हम जाएँगे। चलिए मैं आपके साथ हूँ।" "हम किसलिए जाएँगे? अपनी कब्र की जगह खोजने के लिए?" बादशाह कुछ हताश हुआ। किन्तु फिर ममझाने के स्वर में बोला, "मुकर्रब तू मुझे अपने सगे भाइयों से भी अधिक प्रिय है। इसलिए बताता हूँ। मुझे एक शैतानी ख्वाब रात दिन आना रहता है कि उस रायगढ़ और राजगढ़ किले पर सिंह का एक घायल बच्चा निरन्तर गश्त लगा रहा है। यह घूमता हुआ सिंहशावक मुझे रात-दिन सता रहा है। 602 सम्भाजी