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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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यह ख्वाब मेरी आँखों को डँसता है और मेरे पूरे शरीर में कँपकँपी छूट जाती है।" बादशाह की यह दीन-हीन दशा देखकर मुकर्रबखान स्वयं शर्मिन्दा हो गया। बहुत देर तक दोनों में बातें होती रहीं। अपने मन की बात मुकर्रब के सामने स्पष्ट करते हुए बादशाह ने कहा, "मुकर्रब, अब समय बर्बाद न कर तुम पन्द्रह हजार की फौज लेकर पन्हालगढ़ की ओर बढ़ो।" "पन्हाला की ओर?" मुकर्रब ने चकराकर बादशाह की ओर देखा। "क्यों? मैंने वहाँ शहजादे आजम को पहले ही भेजा है, इसलिए?" "जी हाँ!" "उसकी तुम बिलकुल चिन्ता न करो। वहाँ का सारा सूत्र मैं तुम्हारे हाथ में सौंपता हूँ। हमारा शहजादा भी तुम्हारे हुक्म के अनुसार कार्य करेगा। ऐसा फरमान मैं आज ही जारी कर देता हूँ। तुम्हारी दिशा, तुम्हारा मकसद, तुम्हारा ध्येय है सम्भाऽऽ, सिर्फ सम्भाऽऽ।" "शुक्रिया, जहाँपनाह! इस साधारण बन्दे पर आपने असीम कृपादृष्टि दिखाई है।" सीने पर मुट्ठी मारकर बादशाह के सामने झुकते हुए मुकर्रबखान ने कहा, "मैं भी इसी दक्खिन की मिट्टी का वीर सैनिक हूँ। उस सम्भा को ठिकाने लगाने की हर सम्भव कोशिश करूँगा। मेरी तेज नजर काफिर की हर गतिविधि पर बनी रहेगी। बिजली की तरह तेज और बाणों की तरह तीव्र गति वाले जासूसों को मैं वहाँ भेजूँगा, जो हवा के वेग से पहाड़ियों से टकराकर, उसी वेग से समाचार लेकर वापस आ जाएँगे। लेकिन बादशाह सलामत एक मेहरबानी और कीजिए। मेरे साथ भरपूर खजाना भी दीजिए।" "बेशक, बिलकुल!" "एक राज की बात बताता हूँ जहाँपनाह। मराठों जैसी परोपकारी और लालची जाति पूरी दुनिया में कहीं नहीं होगी। थोड़े से धन की लालच में वे अपने सगे भाई का भी गला घोंट सकते हैं।" "वाह क्या परख है?" आलमगीर प्रसन्न हो गया। "जहाँपनाह, मुर्गे के सामने जैसे दाने डाले जाते हैं, वैसे ही मैं इन मराठों के सामने हीरे जवाहरात फेंकने वाला हूँ। यदि खर्च बढ़ गया तो उसे सरकार द्वारा मंजूर किया जाय।" औरंगजेब बहुत सन्तुष्ट हुआ। रामशेज पर जब क़ब्ज़ा नहीं हो पा रहा था तब औरंगजेब ने द्रव्यलोभ के हथियार का उपयोग किया था। अब्दुल करीम नाम के जमादार के माध्यम से रामशेज के नये मराठा किलेदार को लालच देकर अपनी ओर सम्भाजी ७०३