छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 596, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंधोखों से उनकी कमर तोड़ी जा सकती है।'' एक बार फिर बादशाह की नींद उड़ गयी। वह महाराष्ट्र के अनेक जमींदारों और जागीरदारों को पत्र लिख रहा था— "खानदानी मराठो! हमारे पास आओ। हम आपका सम्मान करते हैं। मुगलों की सल्तनत आपके लिए परायी नहीं है। यह आलमगीर आपको पराया क्यों लगता है? अपने मन के सन्देह को मिटा दीजिए। भाइयो आइये और अपनी जागीरों को लिखवाकर ले जाइये। आपके शिवाजी के साथ हमारी इतनी जानी दुश्मनी थी, वह सब हमने भुला दिया। शिवाजी के जमाई राजा इस औरंगजेब के दल में ऐशोआराम भोग रहे हैं। निंबालकर को हमने बहादुरगढ़ की थानेदारी सौंपी है। जहाँ पर हमारी जनानियों का आवास, रसद भंडार और बड़े बड़े बारूदखाने हैं—ऐसी महत्त्वपूर्ण चौकी हमने महादजी को सौंपी है। महाड़िक जेधे, माने, जगदाले जैसे अनेक नेक मराठे, अनेक गाँवों के मुखिया, बुद्धिमान ब्राह्मण सभी यहाँ पर आनन्द से जी रहे हैं। शिवा का बच्चा सम्भा ही कैसे ऐसा सिरफिरा निकला, पता नहीं। चाहे तो उस बेचारे को भी लेकर आइये। प्रेम से समझाकर और तत्काल पकड़कर यहाँ ले आइये। मुगलों की सल्तनत क्या और आपका स्वराज्य क्या ? हम सब एक हैं।'' बहादुरगढ़ से महादजी निंबालकर आये। उन्होंने बादशाह को एक सुन्दर उपहार भेंट किया। उनके बलिष्ठ शरीर, चौड़े भुजदंड, मजबूत गर्दन और तेजस्वी व्यक्तित्व देखकर औरंगजेब बहुत प्रसन्न हुआ। बड़े आदर से अपने घुटनों तक झुके महादजी के सिर को हाथ से ऊपर उठाते हुए बादशाह बोला, "महादजी आपकी तो तकदीर खुल गयी है। बहादुरगढ़ की थानेदारी करने की जगह हमने आपको रायगढ़ का सिंहासन देने का निश्चय किया है।'' "जहाँपनाह, रायगढ़ की उस पहाड़ी से आपके चरणों के पास की जमीन कहीं अधिक पवित्र है।'' "महादजी, बड़ी फौज दे रहा हूँ आपकी सहायता के लिए। शिवाजी का जमाई सेना लेकर रायगढ़ पर चढ़ाई कर रहा है, यह खबर कितनी बहादुरी की मानी जाएगी। '' महादजी ने बादशाह के पैर पकड़ लिये। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया, "ऐसी बहादुरी मुझसे नहीं हो पाएगी!'' उसने अधीरता से कहा, "हुजूर आपके पास रहते हुए ही मैं वहाँ का कार्य सम्पन्न करता हूँ।'' "वह कैसे?'' महादजी ने महाराष्ट्र के पठार के अनेक जमींदारों को पत्र लिखा था। उनकी प्रतिलिपियाँ उन्होंने बादशाह को दिखाईं। बाड़ी के खेमसावन्त को लिखा गया पत्र इस प्रकार था— "औरंगजेब बादशाह के समान बहादुर दूसरा कोई नहीं है। उन्होंने 594 :: सम्भाजी