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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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का कुछ पता नहीं है। फौज ने रास्ते में मिली कितनी औरतों और बाजारू वेश्याओं को बर्बाद कर दिया। बहुत-सी मर गयीं। बहुत से फौजियों को असाध्य रोग ने जकड़ लिया है। रात के अँधेरे में पुरुष ही पुरुषों पर अत्याचार कर रहे हैं। यहाँ शैतानी बारिश, महामारी और यहाँ के भयानक अकाल से सारी फौज जर्जर हो गयी है। उनका मनोबल टूट चुका है। यदि समय पर इस स्थिति से सँभाला न गया तो एक दिन ये सारे सैनिक सन्तप्त होकर बादशाह को ही जिन्दा दफन कर देंगे।" अल्लाह ने बादशाह को बड़े जटिल चक्कर में फँसा दिया था। उसकी फौज में निरन्तर विवाद बढ़ रहे थे। अमदखान पहले शहंशाह से बड़े अदब से बोलता था। किन्तु परिस्थिति के कारण वह भी बदल गया था। वह फौज की समस्या को बादशाह से कह रहा था। "मेरे आका, अब ज्यादा समय तक फौज को रोके रखना कठिन है।" "हम किसी भी युक्ति से उस सम्भा को सह्याद्रि पर्वत से बाहर निकालेंगे।" "उसकी भी सारी कोशिशें बेकार हो गयीं। सम्भा बाहर आता ही नहीं। वहाँ पर फौजी चौकियाँ बनाने में भी कोई हमारी सहायता नहीं कर रहा है। वह गणोजी शिर्के भी डरपोक निकला, किबला ए आलम।" "इसे कितनी बड़ी बदकिस्मती कहा जाय, वजीरे आजम? वर्षों से उस शिवाजी के दो जामाता हमारे साथ हैं। तीसरा भी हमें ही चाहता है। उसके दस- बारह बड़े सरदार भागकर हमारे साथ आ गये हैं। फिर भी उसका लौंडा सम्भा हमारी पकड़ में नहीं आ रहा है?" बादशाह ने कड़कते हुए कहा, "कुछ भी करो, साम, दाम, दंड, भेद किसी भी हथियार का इस्तेमाल करो किन्तु शिकार हाथ में आना चाहिए।" दंड भेद नीति की बात करते करते बादशाह को अचानक स्मरण हुआ, "जुल्फिकार, क्या हुआ उस खवासखान का?" "जहाँपनाह, वह पाचाड़ के करीब पहुँच गया है।" "आगे की बात कर, कमबख्त।" एकाएक बादशाह की आँखें चमकीं। "सम्भा को छोड़ो, कम से कम राजाराम को तो हाथ में आने दो। वह छोकरा मुट्ठी में आ जाये तो मराठों का दूसरा राजसिंहासन स्थापित करूँ। तब हम गुर्राने वाले उस सम्भा को भी ठिकाने लगाएँगे।" दो दिन में ही बहादुरगढ़ से महादजी निंबालकर और पन्हाला से गणोजी शिर्के आकर मिलने वाले थे। सचमुच उन्हें तुरन्त मिलने का आदेश बादशाह ने ही दिया था। बादशाह अपने समीपी सहयोगियों से बार-बार कह रहा था कि, "रामशेज के किले ने हमें यह सबक सिखा दिया है कि मराठों का यह मूर्ख महाराष्ट्र तोपों के गोलों से नहीं झुकता। झुकेगा भी नहीं। किन्तु षड्यन्त्रों और सम्भाजी :: 593

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