छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 590, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ें"सम्भा की गैरहाजिरी में हमारा जैनुद्दीन राजाराम से भेंट करेगा। वह भी नीचे पाचाड़ के महल में। क्योंकि रायगढ़ पर षड्यन्त्र करके नीचे आ पाना बहुत कठिन है। सम्भा किले पर रहता ही नहीं। इसी का फायदा उठाना है।" "हर कदम फूँक-फूँककर रखो।" "जहाँपनाह, उसकी फिक्र न करें। महादजी निंबालकर के पास बैठकर पाचाड़ का नक्शा बनाया गया है। वहाँ पर उस काफिर सम्भा ने अपनी दादी की याद में मन्दिर बनवाया है। खुली हवा का सेवन करने राजपरिवार कभी-कभी वहाँ आता है। महादजी उनका जमाई है। उसने सभी बारीक बारीक बातें नक्शे में दिखा दी हैं।" निजी बैठक समाप्त हो गयी। बादशाह उठकर बड़े उत्साह से चलता हुआ सामने कचहरी के डेरे में पहुँच गया। वह जुल्फिकार के साथ कागज पत्र देखने लगा। इसी समय एक पत्र को सामने करते हुए जुल्फिकार ने कहा, "जहाँपनाह यह देखिए, सम्भाजी के साले गणोजी शिर्के का यह पत्र-" पत्र पढ़ने से पहले ही बादशाह ने पूछा, "वह गणोजी कोंकण के जंगलों में हमारे लिए दो चौकियाँ बनाने में मदद करने वाला था। उसका क्या हुआ?" "हजरत गणोजी तो बहुत चाहता था। किन्तु उस कवि कलश एवं सम्भा ने उसे बहुत परेशान कर दिया है। उसने लिखा है-" "हाँ, पढ़ो-" "सारी धरती के बादशाह, आलमगीर औरंगजेब बहादुर बालक गणोजी नतसिर अभिवादन। बादशाह सलामत! अब मेरे जैसे खानदानी मराठा की आप अधिक परीक्षा न लें। कृपा करके हमारी सहायता कीजिए। इस पत्र से हुजूर को स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि हमारा मराठों का राजा सम्भाजी एकदम पागल हो गया है। उसे समाप्त कीजिए। हमारे राजा ने कवि कलश नाम के मूर्ख को आत्मीय मित्र बना लिया है। ये दोनों हमारे शिर्के प्रदेश का नाश कर रहे हैं। उन्होंने आगजनी और लूटपाट करके हमारा जीना हराम कर दिया है। रोज हमारे घर जल रहे हैं, फसलें राख हो रही हैं, तबेले आग के हवाले हो रहे हैं। जंजीरे का सिद्दी हमारा मित्र है इसलिए हमारी स्त्रियों और हमारे बच्चों को उनके किले में सुरक्षा मिल गयी है। नहीं तो इस दुष्ट सम्भा ने हमें जन्मभर बिना जागीर के रखा। हमारे लिए यहाँ न घर न द्वार। शिवा सम्भा ने हमें जंगली जानवरों की तरह दर दर भटकने के लिए विवश कर दिया है।" 588 :: सम्भाजी