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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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युद्ध के बहाने अपने महान पिता के साथ चार दिन रहने का अवसर मिलेगा, कुछ नया सीखने को मिलेगा। किन्तु आज मेरे गले में यह दुर्देवी फंदा क्यों डाला जा रहा है? हम अपने जन्मदाता के साथ युद्ध में नहीं जा सकते, उनकी अनुपस्थिति में यहाँ राजधानी में एक क्षण रह नहीं सकते। ऊपर से हमारे द्वेषियों के पक्ष के प्रतिनिधि बने राहुजी सोमनाथ जैसे नाचीज दरबारी को सारा शासन सूत्र सौंप दिया जा रहा है?" शम्भुराजा का मन भर आया, "येसू मेरी आँखों के आगे एक चित्र उभर रहा है। करोड़ों मुहरों की जायदाद और तेजस्वी पिता के होने के बाद भी हम अनाथ हो गये हैं। किसी विवश लावारिस की तरह अपना हाथ बाँधे, कर्मचारियों का आदेश सिर आँखों पर लिए, किसी चोर उचक्के या अपराधी की तरह सिर झुकाये शृंगारपुर की ओर चला जाना है।" येसूबाई ने कहा, "आप को शृंगारपुर में रहकर प्रभावली गाँव का कार्यभार सँभालना है।" "बस! बस! इस तरह अपने ससुरजी के पक्ष में न बोलो। आज उनको युद्ध मे जाने से पहले केवल यह प्रदर्शित करना है कि शम्भुराजा के लिए उनके मन में कोई खोट नहीं है। यह सिद्ध करने के लिए ही वे शृंगारपुर की व्यवस्था का जुआ मेरे गले में बाँध रहे हैं। हमारे अपमान के कम करने के ऐसे प्रयत्न से कलेजे में लगी आग बुझने वाली थोड़े ही है।" जिस प्रकार ग्रीष्म में वर्षा के बादल अचानक घिर आते हैं उसी प्रकार युवराज का मन भर आया। येसूबाई ने युवराज को आँख भरकर देखा। उस अवस्था में भी वे हँसते हुए बोलीं "ऐसे पहाड़ जैसे दृढ़ पिता की छाया होते हुए भी आप इस तरह क्यों डगमगा रहे हैं?" "येसू, शत्रुओं की उखली तोपों से हमारे सीने के चिथड़े चिथड़े हो जाएँ तो भी यह संभाजी जरा भी नहीं डगमगाएगा। किन्तु क्या बताऊँ येसू! अपने पक्ष के स्वार्थी लोगों से आजकल मुझे बहुत भय लगने लगा हैं।" "मतलब ?" "येसू दुख होता है तो केवल इसी बात का कि जब मैं केवल आठ वर्ष का नाबालिग था तब औरंगजेब जैसे दुष्ट सियार की माँद में मुझे अकेले छोड़कर मेरे पिताजी निश्चिन्त भाव से दक्षिण की ओर चले आये थे। किन्तु आज सत्रह-अठारह साल के उसी युवराज को युद्ध में ले जाने से उन्हें डर लग रहा है कि बह वीरता में सवासेर सिद्ध हो जाएगा।" "महाराज को?" "नहीं उनके कर्मचारियों को! और मेरी माताजी सोयराबाई को लग रहा है 58 सम्भाजी