छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
पृष्ठ 611, कुल 793 में से
संदर्भ में पढ़ेंबादशाह ! दया करें और जुल्मी सम्भाजी के अत्याचारों से हमारी रक्षा करें। मराठों का राज्य बचा लें। हमारे राजा के साथ राज्य भी क्षयग्रस्त हो गया है। हमारे राज्य का विनाश निश्चित है। बादशाह सलामत हमारे राज्य को बचा लें। राजाराम को गद्दी पर बिठाएँ। आपकी सेवा के लिए हमलोगों की मजबूत और बुद्धिमान मंडली पूरी तरह तैयार है।'" गणोजी ने एक ही साँस में पत्र को तीन बार पढ़ लिया। उसकी प्रसन्नता छुपाए नहीं छिप रही थी। एक आँख को सिकोड़कर, अपनी मूँछों को बड़े प्यार से ऐंठते हुए गणोजी आह्लादित होकर बोला, "बस सरकार, स्वयं प्रह्लाद पन्त की ओर से ऐसा प्रस्ताव मिल जाने के बाद और क्या चाहिए ? अब आप आगे का कार्य मुझ पर छोड़ दीजिए।" बीच में दो रातें बीत गयीं। इस बीच गणोजी और देवजी शिर्के स्वयं रात के अँधेरे में पन्हालगढ़ का चक्कर लगा आये थे। वहाँ से लौटते ही वे मुकर्रबखान के डेरे में घुस गये। दोनों मुकर्रबखान से ऐसे लिपटे मानो विवाह मंडप में साले बहनोई गले मिल रहे हों। उनके आनन्द की कोई सीमा नहीं थी। वे जोश में आकर उन्मादी की तरह बोल पड़े, "बस खानसाहब ! अब केवल दो दिन और इन्तजार करें। अब पन्हालगढ़ पर फिर भगवा झंडा दिखाई नहीं देगा। बिना किसी कोशिश के किला स्वयं अपनी झोली में आ गिरेगा। आप बस हिम्मत से उसे अपने अधिकार में लेने की तैयारी रखें।" दो पन्हालगढ़ जैसे शक्तिशाली और महत्त्वपूर्ण किले को अजगर ने अपनी चपेट में लेना आरम्भ कर दिया था। यह खबर पाते ही कि उपराजधानी पन्हालगढ़ खतरे में है, शम्भूराजा और कवि कलश ने अपने घोड़े उसी ओर दौड़ाये। कवि कलश ने विशालगढ़ से निकलते ही मलकापुर की अपनी चौकी के लिए सन्देश भेज दिया था। शहाली और कड़वी नदी के पानी से पोसे गये दस हजार घोड़ों में से तीन हजार घोड़ों ने पन्हालगढ़ की ओर उड़ान भरी। राजद्रोहियों ने गढ़ के ऊपर के निशान जानबूझकर हटा दिए थे। आधा किला मुगलों के अधिकार में जा चुका था। इसी बीच पश्चिम मसाई पठार की ओर से सम्भाजी 609