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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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नहीं है, कम से कम सामने का वह किला तो हमारे क़ब्ज़े में दो।" "पन्हाला?" "हाँ, पन्हाला पर क़ब्ज़ा करो ऐसा जहाँपनाह से हुक्म आया है। इसके अतिरिक्त हमारी सैनिक गतिविधियों के लिए भी वह किला बहुत महत्त्वपूर्ण है। बस एक बार उस पर हमारा क़ब्ज़ा हो जाये फिर पीछे के मसाई पठार, उससे थोड़ी ही दूरी पर घोड़ दरी, विशालगढ़ वह अम्बाघाटी आदि सम्पूर्ण इलाके पर अपनी हुकूमत स्थापित करना हमारे लिए बहुत आसान हो जाएगा।" गणोजी कुछ सकपकाया। गला साफ करते हुए भरे गले से उसने कहा, "खान साहब! बड़ा ही कठिन काम बताया है आपने! वहाँ के किलेदार त्र्यंबक महाड़कर और प्रह्लाद पन्त जैसे खुर्राट और निष्ठावान जैसे बुजुर्ग हैं। वे जरा सा भी विचलित होने वाले नहीं हैं।" "अब जाने भी दो गणोजी राजे! अनेक मजबूत और खुर्राट मरगट्ठे लड़ते लड़ते थक गये हैं अब उन्हें शान्ति चाहिए। उन्हें सिर्फ जागीर, जमींदारी, शान्ति और सम्पत्ति चाहिए, बस। जाओ! साथ में हीरे जवाहरात भरी थैलियाँ ले जाओ। किले के रक्षकों, प्रशासकों को द्रव्य दो, उनमें फूट डालो, उन्हें फोड़ो।" "सरकार, बाकी सभी मान जाएँगे, मात्र वह प्रह्लाद पन्त जैसा खुर्राट बूढ़ा आदमी है। उसे बस में करना बहुत मुश्किल है।" गणोजी ने कहा। "शिर्के छोटे बच्चों की तरह बेकार की बातें मत करो। तुम अपने राष्ट्र भक्त उस प्रह्लाद पन्त का यह पत्र ठीक से देखो जो उसने शहजादा आजम को भेजा है।" गणोजी का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया। उन्होंने झपट्टा मारकर वह पत्र मुकर्रबखान के हाथ से ले लिया और साँस रोककर प्रह्लाद पन्त का पत्र पढ़ने लगा— "शहजादे आजम, दया करो। हमें बचाओ। हमारा राजा अविचारी और विवेकहीन ही नहीं पागल भी है। किसी क्लर्क या कर्मचारी की यदि कोई शिकायत उसके पास आते ही वह एक नीति का अनुसरण करता है। वह बिना सोचे-समझे उसे पकड़वाकर मारता-पीटता है और उसका सब कुछ लूट पाट लेता है। उसके लिए कवि कलश ही उसका विश्वासपात्र है शेष सभी उसके लिए बेईमान हैं। महाराज उस कलशा के जाल में बुरी तरह फँस गये हैं। शिर्के ही नहीं किसी का भी घर बर्बाद करने में उसे कोई हिचक नहीं। जागीरदारों को बेइज्जत करना, ओछे और कमीने लोगों की बात मानना उसका स्वभाव बन गया है। वह कान का कच्चा है और एकदम पगला गया है। 608 :: सम्भाजी