छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)
Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography
कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरणचंडिका को ही अपने बस में कर लिया है। वह सम्भा जब हवा से बात करने वाले घोड़े पर बैठकर रण भूमि में उतरता है तो उसके शत्रु भी मन्त्रमुग्ध होकर उसकी ओर देखने लगते हैं। उसकी केवल एक ललकार सैनिकों में बारह भैंसों की शक्ति भर देती है। खानसाहब क्या बताएँ? बताने में भी शर्म आती है। सम्भा ने शिरकान में कदम रखा और हमारी जागीरदारों की संगठित सेना बड़ी मुश्किल से दो-तीन घंटे ही उसके सामने टिक पायी। उसके बाद सभी उल्टे पैर खेतों और जंगलों में शरण लेने के लिए भाग खड़े हुए।" मुकर्रबखान ने गणोजी को थोड़ी देर शान्त होने दिया। परिचारकों ने बीजापुरी ठंडा शरबत पेश किया। गणोजी का यथोचित स्वागत करके मुकर्रबखान ने उन्हें सान्त्वना दी। मुकर्रबखान ने कहा, "गणोजी, जिस तरह सम्भाजी बादशाह के लिए एक संकट है उसी तरह तुम जैसे खानदानी जागीरदारों के लिए भी है।" "खानसाहब, इस गणोजी के पीछे अनेक सच्चे मराठा सरदार और वफादार ब्राह्मण सरदार भी हैं। पीठ पीछे सभी लोग अपनी शेखी बघारते हैं, मूँछों को घी लगाकर ऐंठते हैं किन्तु सम्भा के मैदान में उतरते ही बन्दरों की तरह पूँछ दबाकर भागते हैं! बस! अब और क्या? अब तो हम सभी का यही विचार है.. यह सम्भाजी रणभूमि में..।" एकाएक गणोजी की आँखें भर आयीं। वह भरे गले से बोला, "बादशाह सलामत के हुक्म के अनुसार मैं तैयार हो गया था। मैंने उनसे वादा भी किया था कि हमारे क्षेत्र में वे आयें और जितने चाहें उतने मुगलों के मोर्चे बनाएँ। लेकिन उस महाविनाशक सम्भा ने हमारा सारा शिकराना जलाकर खाककर दिया। जो शिर्के कभी राजा थे आज उजड़े गाँव के भिखारी बन गये हैं। खान साहब आप जो चाहें सो करें, लेकिन उस सम्भा को कसाई के बकरे की तरह छाँट दें।" मुकर्रबखान ने सारी स्थिति का जायजा लिया। उसने गणोजी के शरीर के अंग प्रत्यंग से, उसकी तेज चलती गर्म साँसों से, उसकी मिचमिचाती आँखों से और सम्भाजी के प्रति द्वेष से भरे उसके सिर के बालों से लेकर पैर के नाखून तक का पूरा अन्दाजा लगा लिया। अब उसे विश्वास होने लगा कि गणोजी शिर्के सम्भाजी का नहीं औरंगजेब का ही साला है। देर रात तक विचार विमर्श चलता रहा। मुकर्रबखान की निगाह कनात की खिड़की से बार बार पन्हालगढ़ की ओर जा रही थी। चर्चा अधूरी ही रह गयी। दूसरे दिन सवेरे ही पुनः खान और गणोजी की बातचीत शुरू हो गयी। भोर में ही शहजादा आजम और औरंगजेब की ओर से कई महत्त्वपूर्ण सन्देशे आये। उनका सूक्ष्मता से वाचन किया गया। अब पन्हालगढ़ की पहाड़ी स्वच्छ प्रकाश में जगमगा रही थी। मुकर्रब ने हँसते हुए गणोजी से पूछा, "शिर्के सिंह तो हाथ लगता सम्भाजी :. 607