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छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

छत्रपति संभाजी महाराज (धर्मवीर स्वराज्य-रक्षक एवं मुग़ल-प्रतिरोध सम्पूर्ण इतिहास)

Chhatrapati Sambhaji Maharaj Comprehensive Historical Biography

कमल गोखले / ऐतिहासिक शोध मण्डल द्वारा

DevanagariHindipublished793 पृष्ठ

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पृष्ठ 613

"फिर क्या? इस शिवाजी के पुत्र को व्यभिचारी, व्यसनी, झक्की, मनमौजी आदि कहकर पागल सिद्ध करने के अनेक प्रयास किये गये। किन्तु यह सम्भाजी इन दुष्ट और षड्यन्त्रकारी बूढ़ों के मन की गाँठों को अच्छी तरह पहचानता था। मुझे कत्ल करने के तीन प्रयास अब तक असफल हो चुके हैं। पन्हाळा का यह दाँव चौथा और अन्तिम है।" एक बार दोपहर में कराड के बाजार में नागोजी माने का मतवाला काठियावाड़ी घोड़ा चला जा रहा था। इसी समय उसे घोड़ों पर सवार गिरोजी और अर्जोजी यादव दिखाई पड़े। यादव बन्धुओं का उपहास करते हुए उसने पूछा, "क्यों रे यादवोऽऽ सम्भाजी से तुम्हें जागीर के कागजात मिले क्या?" "हमारी जागीर का फैसला पुराना है। मिल ही जाएँगे मुहर लगे कागज।" गिरोजी ने कहा। "मूर्ख हो तुम सभी। भोसलों की औलाद ने किसी को भी कभी इस तरह जागीर लिखकर दी है, जो तुम्हें दे देंगे? पराया होने पर भी उस बादशाह को हम जागीरदारों पर दया आती है किन्तु इन भोसलों को नहीं।" बातों बातों में ही नागोजी ने कब इन भाइयों के दिमाग में भेद का जहर घोल दिया, उन्हें पता ही नहीं चला। वे दोनों निराश हो गये। गिरोजो जी निराशा के स्वर में बोला, "जाने दो सूबेदार जी, हमारी किस्मत ही खराब है, हमारी राशि में ही दोष है।" "क्यों रे?" "पिछली बार पक्का फैसला होने वाला था कि उन्हीं दो दिनों में बड़े महाराज चल बसे—" अर्जोजी ने निवेदन किया। उन दोनों की ओर देखकर व्यंग्य से हँसते हुए नागोजी ने कहा, "अब छोटे महाराज चल बसें, इससे पहले ही अपने कागज रँगवा लो।" "सरकार, ऐसी अशुभ बात क्यों कहते हैं?" यादव बन्धुओं ने पूछ लिया। नागोजी की जबान सूख गयी। उसने अनुभव किया अचानक उसके मुँह से गलत बात निकल गयी है। अपने को सँभालते हुए उसने कहा, "समय किसी से पूछकर तो नहीं आता है न? अरे भाई जब तक शम्भू जीवित हैं जागीरी अपने पल्ले से बाँध लो। जो चीज गणोजी को एड़ियाँ रगड़कर भी नहीं मिल रही है वही जमाई की कृपा से तुम्हें सहज ही मिल जाएगी। इसलिए बाकी के सभी काम छोड़कर इसे पूरा कर लो। छोटे महाराज कहाँ हैं आजकल? पन्हालगढ़, विशालगढ़ या श्रृंगारपुर? खैर जहाँ भी हों वहीं पर जाकर उनके पैरों में गिर पड़ो। नहीं तो पछताना पड़ेगा। तब यही कहोगे कि भाग्य ने तो दिया था किन्तु कर्म ने खो दिया।" सम्भाजी :: 611